TAA Act 15
धारा 15 · संहिता के कुछ प्रावधानों का संशोधित अनुप्रयोग।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) संहिता या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक अनुसूचित अपराध को संहिता की धारा 2 के खंड (सी) के अर्थ में संज्ञेय अपराध माना जाएगा और उस खंड में परिभाषित "संज्ञेय मामला" को तदनुसार समझा जाएगा।
(2) संहिता की धारा 167 अनुसूचित अपराध से संबंधित मामले में निम्नलिखित संशोधनों के अधीन लागू होगी—
(क) उपधारा (1) में "न्यायिक मजिस्ट्रेट" के संदर्भ को "न्यायिक मजिस्ट्रेट या कार्यकारी मजिस्ट्रेट" के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा;
(ख) उपधारा (2) में जहां कहीं भी “पंद्रह दिन”, “नब्बे दिन” और “साठ दिन” का उल्लेख हो, उन्हें क्रमशः “तीस दिन”, “एक वर्ष” और “एक वर्ष” के रूप में समझा जाएगा; और
(ग) उसकी उपधारा (2ए) को हटा दिया गया माना जाएगा।
(3) संहिता की धारा 366 से 371 और धारा 392 अनुसूचित अपराध से जुड़े मामले में इस प्रकार लागू होंगी कि जहां कहीं भी सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय का उल्लेख हो, उन्हें क्रमशः विशेष न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के रूप में समझा जाएगा।
(4) संहिता की धारा 438 में कोई बात आतंकवादी प्रभावित क्षेत्र में अनुसूचित अपराध करने के आरोप में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से जुड़े किसी मामले पर लागू नहीं होगी।
(5) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, अनुसूचित अपराध के आरोपी किसी व्यक्ति को, यदि वह हिरासत में है, तो जमानत पर या अपने स्वयं के मुचलके पर तब तक रिहा नहीं किया जाएगा जब तक कि—
(क) लोक अभियोजक को ऐसी रिहाई के आवेदन का विरोध करने का अवसर दिया गया है, और
(ख) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है, न्यायालय संतुष्ट है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
(6) उपधारा (5) में निर्दिष्ट जमानत देने पर सीमाएं, संहिता या किसी अन्य कानून के तहत जमानत देने पर लागू सीमाओं के अतिरिक्त हैं।
(2) संहिता की धारा 167 अनुसूचित अपराध से संबंधित मामले में निम्नलिखित संशोधनों के अधीन लागू होगी—
(क) उपधारा (1) में "न्यायिक मजिस्ट्रेट" के संदर्भ को "न्यायिक मजिस्ट्रेट या कार्यकारी मजिस्ट्रेट" के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा;
(ख) उपधारा (2) में जहां कहीं भी “पंद्रह दिन”, “नब्बे दिन” और “साठ दिन” का उल्लेख हो, उन्हें क्रमशः “तीस दिन”, “एक वर्ष” और “एक वर्ष” के रूप में समझा जाएगा; और
(ग) उसकी उपधारा (2ए) को हटा दिया गया माना जाएगा।
(3) संहिता की धारा 366 से 371 और धारा 392 अनुसूचित अपराध से जुड़े मामले में इस प्रकार लागू होंगी कि जहां कहीं भी सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय का उल्लेख हो, उन्हें क्रमशः विशेष न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के रूप में समझा जाएगा।
(4) संहिता की धारा 438 में कोई बात आतंकवादी प्रभावित क्षेत्र में अनुसूचित अपराध करने के आरोप में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से जुड़े किसी मामले पर लागू नहीं होगी।
(5) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, अनुसूचित अपराध के आरोपी किसी व्यक्ति को, यदि वह हिरासत में है, तो जमानत पर या अपने स्वयं के मुचलके पर तब तक रिहा नहीं किया जाएगा जब तक कि—
(क) लोक अभियोजक को ऐसी रिहाई के आवेदन का विरोध करने का अवसर दिया गया है, और
(ख) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है, न्यायालय संतुष्ट है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
(6) उपधारा (5) में निर्दिष्ट जमानत देने पर सीमाएं, संहिता या किसी अन्य कानून के तहत जमानत देने पर लागू सीमाओं के अतिरिक्त हैं।
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