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धारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन (1) यदि किसी लघु अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि मामला धारा 260 [या धारा 261] के अधीन संक्षेपतः निपटाया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस दशा के जिसमें वह लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से इसके प्रतिकूल राय रखता है, अभियुक्त को ऐसा समन जारी करेगा जिसमें उससे…
पूरा पढ़ेंमामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
(1) यदि किसी छोटे अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में, मामले का निपटारा धारा 283 या धारा 284 के तहत संक्षेप में किया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस स्थिति के जब वह लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से विपरीत राय रखता हो, आरोपी को समन जारी करेगा जिसमें उसे या तो स्वयं या किसी अधिवक्ता के माध्यम…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
यदि कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शुरू की गई है, तो मजिस्ट्रेट बिना किसी देरी के आरोपी को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा:-- (i) पुलिस रिपोर्ट; (ii) धारा 154 के तहत दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट; (iii) धारा 161 की उपधारा (3) के तहत उन सभी व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए हैं जिन्हें…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
यदि कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट पर शुरू की गई है, तो मजिस्ट्रेट बिना किसी देरी के, और किसी भी स्थिति में आरोपी की पेशी या उपस्थिति की तारीख से चौदह दिनों से अधिक समय के भीतर, आरोपी और पीड़ित (यदि किसी वकील द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा: (i) पुलिस…
पूरा पढ़ेंधारा 208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना
208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना जहां पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित किसी मामले में धारा 204 के अधीन आदेशिका जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, वहां मजिस्ट्रेट अभियुक्त को निम्नलिखित में से…
पूरा पढ़ेंसत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्तों को बयानों और दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराना।
जहां, पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किए गए मामले में, धारा 227 के तहत प्रक्रिया जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट तुरंत आरोपी को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा: (i) मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना
209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना जब पुलिस रिपोर्ट पर या अन्यथा संस्थित किसी मामले में अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है और मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तब वह— (क) यथास्थिति,…
पूरा पढ़ेंजब अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मामले को सत्र न्यायालय को सौंप दिया जाता है।
जब पुलिस रिपोर्ट या किसी अन्य माध्यम से दर्ज किए गए किसी मामले में आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होता है या उसे लाया जाता है और मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो वह— (क) धारा 230 या धारा 231 के प्रावधानों का अनुपालन करने के बाद मामले को सत्र न्यायालय को…
पूरा पढ़ेंधारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया (1) जब पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित किसी मामले में (जिसे इसमें इसके पश्चात् परिवाद-मामला कहा गया है) मजिस्ट्रेट को अपने द्वारा की जा रही जांच या विचारण के दौरान यह प्रतीत कराया जाता है कि उस अपराध के संबंध में,…
पूरा पढ़ेंकिसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
(1) जब किसी ऐसे मामले में, जो पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किया गया हो (जिसे इसके बाद शिकायत मामला कहा जाएगा), मजिस्ट्रेट को उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे के दौरान यह प्रतीत हो कि पुलिस द्वारा उस अपराध के संबंध में जांच चल रही है जो उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे का विषय है, तो मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
211. आरोप की अंतर्वस्तु (1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में वह अपराध कथित किया जाएगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है। (2) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया है, तो आरोप में उस अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा। (3) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई…
पूरा पढ़ेंआरोप की सामग्री।
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का उल्लेख होगा जिसके लिए अभियुक्त पर आरोप लगाया गया है। (2) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम देता है, तो अपराध को आरोप में केवल उसी नाम से वर्णित किया जा सकता है। (3) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम नहीं देता है, तो अपराध की…
पूरा पढ़ेंधारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां (1) आरोप में अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके विरुद्ध, या उस वस्तु (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी जो अभियुक्त को उस बात की सूचना देने के लिए,…
पूरा पढ़ेंसमय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
(1) आरोप पत्र में कथित अपराध के समय और स्थान तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) जिसके विरुद्ध या उस वस्तु (यदि कोई हो) जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, के बारे में ऐसे विवरण शामिल होंगे जो आरोपी को उस मामले की सूचना देने के लिए यथोचित रूप से पर्याप्त हों जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है। (2) जब अभियुक्त पर आपराधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए जब मामले की प्रकृति ऐसी है कि धारा 211 और धारा 212 में वर्णित विशिष्टियां अभियुक्त को उस बात की पर्याप्त सूचना नहीं देतीं जिसका उस पर आरोप है, तब आरोप में उस रीति की, जिससे अभिकथित अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां भी अंतर्विष्ट होंगी जो उस प्रयोजन के लिए पर्याप्त…
पूरा पढ़ेंअपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
जब मामले की प्रकृति ऐसी हो कि धारा 234 और 235 में उल्लिखित विवरण अभियुक्त को उस मामले की पर्याप्त सूचना न दें जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है, तो आरोप पत्र में कथित अपराध को अंजाम देने के तरीके के ऐसे विवरण भी शामिल होंगे जो उस उद्देश्य के लिए पर्याप्त होंगे। चित्र। (क) ए पर किसी निश्चित समय और स्थान पर किसी निश्चित…
पूरा पढ़ेंधारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है प्रत्येक आरोप में किसी अपराध का वर्णन करने में प्रयुक्त शब्द उस अर्थ में प्रयुक्त हुए समझे जाएंगे जो उन्हें उस विधि द्वारा क्रमशः दिया गया है जिसके अधीन ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंयहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
प्रत्येक आरोप में, अपराध का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त शब्दों को उस कानून द्वारा निर्धारित अर्थ में प्रयुक्त माना जाएगा जिसके तहत ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंधारा 215. गलतियों का प्रभाव
215. गलतियों का प्रभाव अपराध को या उन विशिष्टियों को, जिनका आरोप में कथित किया जाना अपेक्षित है, कथित करने में कोई गलती, और अपराध या उन विशिष्टियों को कथित करने का कोई लोप, मामले के किसी भी प्रक्रम में तात्विक न समझा जाएगा, जब तक कि अभियुक्त वस्तुतः ऐसी गलती या लोप से भ्रमित न हो गया हो और उससे न्याय की विफलता न हो गई…
पूरा पढ़ेंत्रुटियों का प्रभाव।
अपराध या आरोप में बताए जाने वाले विवरणों को बताने में कोई त्रुटि, या अपराध या उन विवरणों को बताने में कोई चूक, मामले के किसी भी चरण में महत्वपूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक कि आरोपी वास्तव में ऐसी त्रुटि या चूक से गुमराह न हुआ हो और इसके कारण न्याय में विफलता न हुई हो। चित्र। (क) ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा…
पूरा पढ़ेंधारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा (1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी भी समय किसी आरोप को परिवर्तित कर सकेगा या उसमें परिवर्धन कर सकेगा। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा। (3) यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण…
पूरा पढ़ेंन्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
(1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय किसी आरोप में परिवर्तन या जोड़ कर सकता है। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर समझाया जाएगा। (3) यदि किसी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन इस प्रकार का हो कि न्यायालय की राय में मुकदमे की कार्यवाही तुरंत शुरू करने से अभियुक्त को उसके बचाव में या…
पूरा पढ़ेंधारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना जब कभी विचारण के प्रारंभ के पश्चात् न्यायालय द्वारा कोई आरोप परिवर्तित किया जाता है या उसमें परिवर्धन किया जाता है, तब अभियोजक को और अभियुक्त को यह अनुज्ञात होगा कि वे— (क) किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी हो, पुनः बुलाएं या पुनः समन करें और ऐसे…
पूरा पढ़ेंआरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
जब भी मुकदमे की शुरुआत के बाद न्यायालय द्वारा आरोप में परिवर्तन या कोई आरोप जोड़ा जाता है, तो अभियोजक और आरोपी को इसकी अनुमति दी जाएगी— (क) किसी भी गवाह को, जिसकी पहले जांच की जा चुकी हो, वापस बुलाना या पुनः तलब करना और ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के संबंध में उसकी जांच करना, जब तक कि न्यायालय, लिखित रूप में दर्ज किए…
पूरा पढ़ेंधारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप (1) प्रत्येक पृथक् अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विचारण पृथक्तः किया जाएगा: परन्तु जहां अभियुक्त व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसी वांछा करता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है कि ऐसे व्यक्ति पर उससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना…
पूरा पढ़ेंअलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
(1) प्रत्येक पृथक अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, एक अलग आरोप होगा, और ऐसे प्रत्येक आरोप की सुनवाई अलग से की जाएगी: बशर्ते कि यदि आरोपी व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि इससे उस व्यक्ति को कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के…
पूरा पढ़ेंधारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा (1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के एक से अधिक अपराधों का, जो ऐसे अपराधों में से प्रथम से अंतिम तक बारह मास की कालावधि के भीतर किए गए हैं, अभियोग है, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में हों या नहीं, तब उस पर उनमें से किसी भी संख्या के…
पूरा पढ़ेंएक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।
(1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही प्रकार के एक से अधिक अपराधों का आरोप लगाया जाता है, जो पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह महीनों के अंतराल में किए गए हों, चाहे वे अपराध एक ही व्यक्ति के संबंध में हों या नहीं, तो उस पर अधिकतम पाँच अपराधों के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में उन अपराधों के लिए मुकदमा चलाया…
पूरा पढ़ेंधारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण (1) यदि आपस में इस प्रकार संसक्त कार्यों की, कि वे एक ही संव्यवहार बनते हैं, एक ही शृंखला में एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अपराध किए जाते हैं, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा। (2) जब किसी व्यक्ति पर, जिस पर…
पूरा पढ़ेंएक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
(1) यदि एक ही लेन-देन बनाने के लिए आपस में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, तो उस पर प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है। (2) जब किसी व्यक्ति पर धारा 235 की उपधारा (2) या धारा 242 की उपधारा (1) में दिए गए…
पूरा पढ़ेंधारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है (1) यदि कोई एक कार्य या कार्यों की शृंखला ऐसी प्रकृति की है कि यह संदेहपूर्ण है कि जो तथ्य साबित किए जा सकते हैं वे कई अपराधों में से कौन-सा अपराध बनेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराधों को या उनमें से किसी को करने का आरोप लगाया जा सकेगा, और ऐसे आरोपों में से कितने…
पूरा पढ़ेंजहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
(1) यदि कोई एक कृत्य या कृत्यों की श्रृंखला इस प्रकार की हो कि यह संदेह हो कि सिद्ध किए जा सकने वाले तथ्य अनेक अपराधों में से कौन सा अपराध गठित करेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सभी या किसी भी अपराध को करने का आरोप लगाया जा सकता है, और ऐसे कितने भी आरोपों पर एक साथ मुकदमा चलाया जा सकता है; या उस पर उक्त अपराधों में से किसी…
पूरा पढ़ेंधारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है (1) जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जो कई विशिष्टियों से मिलकर बना है, और उनमें से केवल कुछ का संयोजन एक पूर्ण लघु अपराध बनता है, और ऐसा संयोजन साबित हो जाता है किंतु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होतीं, तब वह उस लघु अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि…
पूरा पढ़ेंजब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
(1) जब किसी व्यक्ति पर अनेक विवरणों से युक्त किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है, जिनमें से कुछ का संयोजन ही एक पूर्ण लघु अपराध का गठन करता है, और ऐसा संयोजन सिद्ध हो जाता है, परन्तु शेष विवरण सिद्ध नहीं होते, तो उसे लघु अपराध का दोषी ठहराया जा सकता है, यद्यपि उस पर इसका आरोप नहीं लगाया गया था। (2) जब किसी व्यक्ति पर…
पूरा पढ़ेंधारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे निम्नलिखित व्यक्तियों पर आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक साथ किया जा सकेगा, अर्थात्— (क) वे व्यक्ति, जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध के अभियुक्त हैं; (ख) वे व्यक्ति, जो किसी अपराध के अभियुक्त हैं, और वे व्यक्ति, जो ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के…
पूरा पढ़ेंकिन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
निम्नलिखित व्यक्तियों पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है, अर्थात्:— (क) एक ही लेन-देन के दौरान किए गए एक ही अपराध के आरोपी व्यक्ति; (ख) किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति तथा ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के आरोपी व्यक्ति; (ग) धारा 242 के अर्थ में एक ही प्रकार के एक से अधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण जब उसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक शीर्षों वाला आरोप विरचित किया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक पर दोषसिद्धि हो गई है, तब परिवादी, या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी, न्यायालय की सम्मति से, शेष आरोप या आरोपों को प्रत्याहृत कर सकेगा, अथवा…
पूरा पढ़ेंकई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक आरोपों से संबंधित अभियोग लगाया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक आरोपों पर दोष सिद्ध हो चुका होता है, तो शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष का अधिकारी न्यायालय की सहमति से शेष अभियोग वापस ले सकता है, या न्यायालय स्वयं ऐसे अभियोगों की जांच या मुकदमे पर रोक लगा सकता है, और इस प्रकार…
पूरा पढ़ेंधारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक विचारण में अभियोजन का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंइस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक मुकदमे में अभियोजन पक्ष का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन जब अभियुक्त धारा 209 के अधीन मामले की सुपुर्दगी के अनुसरण में न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, तब अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करके और यह कथन करके कि वह अभियुक्त का दोष किस साक्ष्य द्वारा साबित करना प्रस्थापित करता है, अपने मामले का प्रारंभिक…
पूरा पढ़ेंअभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
जब अभियुक्त धारा 232 के तहत या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत मामले की सुनवाई के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है या उसे लाया जाता है, तो अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करते हुए और यह बताते हुए अपना मामला शुरू करेगा कि वह किस साक्ष्य के माध्यम से अभियुक्त के अपराध को साबित करना चाहता है।
पूरा पढ़ेंधारा 227. उन्मोचन
227. उन्मोचन यदि मामले के अभिलेख पर और उसके साथ पेश किए गए दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात्, तथा इस निमित्त अभियुक्त के और अभियोजन के निवेदन सुनने के पश्चात्, न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण…
पूरा पढ़ेंस्राव होना।
(1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की सुनवाई की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद, और इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने…
पूरा पढ़ेंधारा 228. आरोप की विरचना
228. आरोप की विरचना (1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार करने और सुनवाई के पश्चात् न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने कोई ऐसा अपराध किया है जो— (क) केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकेगा और आदेश द्वारा मामला विचारण के लिए मुख्य न्यायिक…
पूरा पढ़ेंआरोप का निर्धारण।
(1) यदि उपर्युक्त विचार-विमर्श और सुनवाई के बाद न्यायाधीश की यह राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है जो— (क) यदि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप निर्धारित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम…
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंअभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
यदि अभियुक्त अपना पक्ष रखने से इनकार करता है, या अपना पक्ष नहीं रखता है, या मुकदमे की मांग करता है, या धारा 229 के तहत दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो न्यायाधीश गवाहों की जांच के लिए एक तारीख तय करेगा, और अभियोजन पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज या अन्य वस्तु को पेश करने के लिए…
पूरा पढ़ेंअभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
यदि अभियुक्त अपना पक्ष रखने से इनकार करता है, या पक्ष नहीं रखता है, या मुकदमा चलाने का दावा करता है, या धारा 252 के तहत दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो न्यायाधीश गवाहों की परीक्षा के लिए एक तारीख तय करेगा, 97 और अभियोजन पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह की उपस्थिति या किसी दस्तावेज़ या अन्य वस्तु के उत्पादन को बाध्य करने के…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) इस प्रकार निर्धारित तिथि पर, न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा। (2) न्यायाधीश अपने विवेक से किसी गवाह की जिरह को तब तक स्थगित करने की अनुमति दे सकता है जब तक कि किसी अन्य गवाह या गवाहों की जांच न हो जाए या आगे जिरह के लिए किसी गवाह को वापस बुला…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) निर्धारित तिथि पर न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा: बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किसी गवाह के साक्ष्य को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया जा सकता है। (2) किसी लोक सेवक के साक्ष्य का बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लिया जा सकता…
पूरा पढ़ेंबरी होना।
यदि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर विचार करने, आरोपी से पूछताछ करने और इस मुद्दे पर अभियोजन और बचाव पक्ष की बात सुनने के बाद न्यायाधीश को लगता है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो न्यायाधीश बरी करने का आदेश दर्ज करेगा।
पूरा पढ़ेंबरी होना।
यदि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर विचार करने, आरोपी से पूछताछ करने और इस मुद्दे पर अभियोजन और बचाव पक्ष की बात सुनने के बाद न्यायाधीश को लगता है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो न्यायाधीश बरी करने का आदेश दर्ज करेगा।
पूरा पढ़ेंरक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
(1) जहां अभियुक्त धारा 232 के तहत बरी नहीं होता है, तो उसे अपना बचाव करने और उसके समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जाएगा। (2) यदि अभियुक्त कोई लिखित बयान देता है, तो न्यायाधीश उसे अभिलेख के साथ दर्ज करेगा। (3) यदि अभियुक्त किसी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज़ या वस्तु के उत्पादन के…
पूरा पढ़ेंरक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
(1) जहां अभियुक्त धारा 255 के तहत बरी नहीं होता है, तो उसे अपना बचाव करने और उसके समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जाएगा। (2) यदि अभियुक्त कोई लिखित बयान देता है, तो न्यायाधीश उसे अभिलेख में दाखिल करेगा। (3) यदि अभियुक्त किसी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज़ या वस्तु के उत्पादन के लिए…
पूरा पढ़ेंधारा 234. तर्क
234. तर्क जब प्रतिरक्षा के साक्षियों की (यदि कोई हों) परीक्षा पूरी हो जाती है, तब अभियोजक अपने मामले का उपसंहार करेगा और अभियुक्त या उसका प्लीडर उत्तर देने का हकदार होगा: परन्तु जहां अभियुक्त या उसके प्लीडर द्वारा विधि का कोई प्रश्न उठाया जाता है, वहां अभियोजन, न्यायाधीश की अनुज्ञा से, विधि के ऐसे प्रश्न के संबंध में…
पूरा पढ़ेंतर्क।
जब बचाव पक्ष के गवाहों (यदि कोई हो) की जांच पूरी हो जाए, तो अभियोजक अपना पक्ष संक्षेप में प्रस्तुत करेगा और अभियुक्त या उसका वकील जवाब देने का हकदार होगा। बशर्ते कि यदि अभियुक्त या उसके अधिवक्ता द्वारा कानून का कोई मुद्दा उठाया जाता है, तो अभियोजन पक्ष न्यायाधीश की अनुमति से ऐसे कानूनी मुद्दे के संबंध में अपनी दलीलें…
पूरा पढ़ेंधारा 235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय
235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय (1) तर्कों और विधि के प्रश्नों (यदि कोई हों) को सुनने के पश्चात् न्यायाधीश मामले में निर्णय देगा। (2) यदि अभियुक्त दोषसिद्ध किया जाता है, तो न्यायाधीश, जब तक कि वह धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही न करे, दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनेगा और तब विधि के अनुसार उस पर…
पूरा पढ़ेंदोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय।
(1) दलीलों और विधि संबंधी बिंदुओं (यदि कोई हो) को सुनने के बाद, न्यायाधीश मामले में यथाशीघ्र, दलीलों के पूर्ण होने की तिथि से तीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय देगा, जिसे लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से पैंतालीस दिनों की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है। (2) यदि अभियुक्त दोषी पाया जाता है, तो न्यायाधीश, जब तक कि वह…
पूरा पढ़ेंधारा 236. पूर्व दोषसिद्धि
236. पूर्व दोषसिद्धि ऐसे मामले में, जहां धारा 211 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन पूर्व दोषसिद्धि का आरोप लगाया जाता है और अभियुक्त यह स्वीकार नहीं करता कि वह आरोप में अभिकथित रूप से पूर्व में दोषसिद्ध किया जा चुका है, वहां न्यायाधीश, धारा 229 या धारा 235 के अधीन उक्त अभियुक्त को दोषसिद्ध कर देने के पश्चात्, अभिकथित…
पूरा पढ़ेंपूर्व दोषसिद्धि।
ऐसे मामले में जहां धारा 234 की उपधारा (7) के प्रावधानों के तहत पूर्व दोषसिद्धि का आरोप लगाया गया है, और आरोपी यह स्वीकार नहीं करता है कि उसे आरोप में बताए अनुसार पहले दोषी ठहराया गया है, तो न्यायाधीश उक्त आरोपी को धारा 252 या धारा 258 के तहत दोषी ठहराने के बाद कथित पूर्व दोषसिद्धि के संबंध में साक्ष्य ले सकता है, और…
पूरा पढ़ेंधारा 237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया
237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया (1) धारा 199 की उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान करने वाला सत्र न्यायालय मामले का विचारण, मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामलों से अन्यथा संस्थित वारंट-मामलों के विचारण की प्रक्रिया के अनुसार करेगा: परन्तु वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध…
पूरा पढ़ेंधारा 222 की उपधारा (2) के तहत दायर मामलों में प्रक्रिया।
(1) धारा 222 की उपधारा (2) के तहत किसी अपराध का संज्ञान लेने वाला सत्र न्यायालय, मजिस्ट्रेट न्यायालय के समक्ष पुलिस रिपोर्ट के अलावा अन्य किसी आधार पर दायर वारंट मामलों के परीक्षण की प्रक्रिया के अनुसार मामले की सुनवाई करेगा। बशर्ते कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किए जाने का आरोप है, जब तक कि सत्र न्यायालय, दर्ज किए…
पूरा पढ़ेंधारा 238. धारा 207 का अनुपालन
238. धारा 207 का अनुपालन जब किसी पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट-मामले में अभियुक्त विचारण के प्रारंभ में मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, तब मजिस्ट्रेट अपना यह समाधान कर लेगा कि उसने धारा 207 के उपबंधों का अनुपालन कर लिया है।
पूरा पढ़ेंधारा 230 का अनुपालन।
जब किसी पुलिस रिपोर्ट पर शुरू किए गए वारंट मामले में, आरोपी मुकदमे की शुरुआत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होता है या लाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसने धारा 230 के प्रावधानों का अनुपालन किया है।
पूरा पढ़ेंधारा 239. कब अभियुक्त उन्मोचित किया जाएगा
239. कब अभियुक्त उन्मोचित किया जाएगा यदि पुलिस रिपोर्ट और धारा 173 के अधीन उसके साथ भेजे गए दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात् और अभियुक्त की ऐसी परीक्षा, यदि कोई हो, करने के पश्चात्, जो मजिस्ट्रेट आवश्यक समझे, तथा अभियोजन और अभियुक्त को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, मजिस्ट्रेट यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध…
पूरा पढ़ेंजब आरोपी को बरी कर दिया जाएगा।
(1) अभियुक्त धारा 230 के तहत दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराए जाने की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि पुलिस रिपोर्ट और धारा 193 के तहत इसके साथ भेजे गए दस्तावेजों पर विचार करने और अभियुक्त की ऐसी जांच करने के बाद, चाहे शारीरिक रूप से या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों…
पूरा पढ़ेंधारा 240. आरोप की विरचना
240. आरोप की विरचना (1) यदि ऐसे विचार, परीक्षा, यदि कोई हो, और सुनवाई पर मजिस्ट्रेट की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है, जो इस अध्याय के अधीन विचारणीय है और जिसका विचारण करने के लिए ऐसा मजिस्ट्रेट सक्षम है तथा जो उसकी राय में उसके द्वारा पर्याप्त रूप से दंडित किया जा सकता है, तो…
पूरा पढ़ेंआरोप का निर्धारण।
(1) यदि ऐसे विचार, जांच (यदि कोई हो) और सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट की राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने इस अध्याय के अंतर्गत विचारणीय अपराध किया है, जिसका विचारण करने के लिए ऐसा मजिस्ट्रेट सक्षम है और जिसे उसकी राय में वह पर्याप्त रूप से दंडित कर सकता है, तो वह आरोप पर पहली सुनवाई की तारीख से साठ दिनों…
पूरा पढ़ेंधारा 241. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
241. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि यदि अभियुक्त दोषी होने का अभिवाक् करता है, तो मजिस्ट्रेट उस अभिवाक् को अभिलिखित करेगा और अपने विवेकानुसार उस पर उसे दोषसिद्ध कर सकेगा।
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो मजिस्ट्रेट उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंधारा 242. अभियोजन के लिए साक्ष्य
242. अभियोजन के लिए साक्ष्य (1) यदि अभियुक्त अभिवाक् करने से इनकार करता है या अभिवाक् नहीं करता, या विचारण किए जाने का दावा करता है, अथवा मजिस्ट्रेट धारा 241 के अधीन अभियुक्त को दोषसिद्ध नहीं करता, तो मजिस्ट्रेट साक्षियों की परीक्षा के लिए कोई तारीख नियत करेगा। परन्तु मजिस्ट्रेट अभियुक्त को, पुलिस द्वारा अन्वेषण के…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) यदि अभियुक्त अपना पक्ष रखने से इनकार करता है या अपना पक्ष नहीं रखता है, या मुकदमे की मांग करता है, या मजिस्ट्रेट धारा 264 के तहत अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराता है, तो मजिस्ट्रेट गवाहों की परीक्षा के लिए एक तिथि निर्धारित करेगा: बशर्ते कि मजिस्ट्रेट जांच के दौरान पुलिस द्वारा दर्ज किए गए गवाहों के बयान आरोपी को पहले…
पूरा पढ़ेंधारा 243. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य
243. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य (1) तब अभियुक्त से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपनी प्रतिरक्षा आरंभ करे और अपना साक्ष्य पेश करे; और यदि अभियुक्त कोई लिखित कथन देता है, तो मजिस्ट्रेट उसे अभिलेख के साथ फाइल करेगा। (2) यदि अभियुक्त, अपनी प्रतिरक्षा आरंभ कर देने के पश्चात्, मजिस्ट्रेट से यह आवेदन करता है कि वह किसी साक्षी की…
पूरा पढ़ेंबचाव पक्ष के साक्ष्य।
(1) इसके बाद अभियुक्त को अपना बचाव करने और अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जाएगा; और यदि अभियुक्त कोई लिखित बयान देता है, तो मजिस्ट्रेट उसे अभिलेख में दर्ज करेगा। (2) यदि अभियुक्त, अपना बचाव प्रस्तुत करने के बाद, किसी गवाह की परीक्षा या जिरह के उद्देश्य से उसकी उपस्थिति को बाध्य करने, या किसी दस्तावेज या अन्य…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) जब किसी वारंट मामले में, जो पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किया गया हो, आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट अभियोजन की सुनवाई करेगा और अभियोजन के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्य लेगा। (2) मजिस्ट्रेट अभियोजन पक्ष के आवेदन पर उसके किसी गवाह को समन जारी कर…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) जब किसी वारंट मामले में, जो पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किया गया हो, आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट अभियोजन की सुनवाई करेगा और अभियोजन के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्य लेगा। (2) मजिस्ट्रेट अभियोजन पक्ष के आवेदन पर उसके किसी गवाह को समन जारी कर…
पूरा पढ़ेंधारा 245. अभियुक्त कब उन्मोचित किया जाएगा
245. अभियुक्त कब उन्मोचित किया जाएगा (1) यदि धारा 244 में निर्दिष्ट सब साक्ष्य ले लेने पर मजिस्ट्रेट, ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएंगे, यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध ऐसा कोई मामला नहीं बनाया गया है, जो यदि उसका खंडन न किया जाए तो उसकी दोषसिद्धि को न्यायानुमत ठहराएगा, तो मजिस्ट्रेट उसे उन्मोचित कर देगा। (2) इस…
पूरा पढ़ेंजब आरोपी को बरी कर दिया जाएगा।
(1) यदि धारा 267 में निर्दिष्ट सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, मजिस्ट्रेट, दर्ज किए जाने वाले कारणों से, यह मानता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई मामला नहीं बनता है, जो कि खंडन न होने पर उसकी दोषसिद्धि को उचित ठहराएगा, तो मजिस्ट्रेट उसे बरी कर देगा। (2) इस धारा में ऐसा कुछ भी नहीं माना जाएगा जिससे मजिस्ट्रेट को…
पूरा पढ़ेंवह प्रक्रिया जिसमें आरोपी को बरी नहीं किया जाता है।
(1) यदि ऐसा साक्ष्य लिए जाने पर, या मामले के किसी पूर्व चरण में, मजिस्ट्रेट की राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने इस अध्याय के अंतर्गत विचारणीय अपराध किया है, जिसका विचारण करने के लिए ऐसा मजिस्ट्रेट सक्षम है और जिसे, उसकी राय में, वह पर्याप्त रूप से दंडित कर सकता है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध लिखित…
पूरा पढ़ेंवह प्रक्रिया जिसमें आरोपी को बरी नहीं किया जाता है।
(1) यदि ऐसा साक्ष्य लिए जाने पर, या मामले के किसी पूर्व चरण में, मजिस्ट्रेट की राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने इस अध्याय के अंतर्गत विचारणीय अपराध किया है, जिसका विचारण करने के लिए ऐसा मजिस्ट्रेट सक्षम है और जिसे, उसकी राय में, वह पर्याप्त रूप से दंडित कर सकता है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध लिखित…
पूरा पढ़ेंधारा 247. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य
247. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य तब अभियुक्त से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपनी प्रतिरक्षा आरंभ करे और अपना साक्ष्य पेश करे; और धारा 243 के उपबंध उस मामले को लागू होंगे।
पूरा पढ़ेंबचाव पक्ष के साक्ष्य।
इसके बाद अभियुक्त को अपना बचाव प्रस्तुत करने और साक्ष्य पेश करने के लिए कहा जाएगा; और धारा 266 के प्रावधान इस मामले पर लागू होंगे।
पूरा पढ़ेंधारा 248. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
248. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि (1) यदि इस अध्याय के अधीन किसी ऐसे मामले में, जिसमें आरोप विरचित किया गया है, मजिस्ट्रेट अभियुक्त को दोषी नहीं पाता, तो वह दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा। (2) जहां इस अध्याय के अधीन किसी मामले में मजिस्ट्रेट अभियुक्त को दोषी पाता है, किंतु धारा 325 या धारा 360 के उपबंधों के अनुसार…
पूरा पढ़ेंदोषमुक्ति या दोषसिद्धि।
(1) यदि इस अध्याय के अंतर्गत किसी मामले में, जिसमें आरोप तय किया गया हो, मजिस्ट्रेट अभियुक्त को निर्दोष पाता है, तो वह बरी करने का आदेश दर्ज करेगा। (2) जहाँ इस अध्याय के अंतर्गत किसी मामले में मजिस्ट्रेट अभियुक्त को दोषी पाता है, परन्तु धारा 364 या धारा 401 के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता, तो वह सजा के…
पूरा पढ़ेंधारा 249. परिवादी की अनुपस्थिति
249. परिवादी की अनुपस्थिति जब कार्यवाहियां परिवाद पर संस्थित की गई हैं और मामले की सुनवाई के लिए नियत किसी दिन परिवादी अनुपस्थित है तथा अपराध का विधिपूर्वक शमन किया जा सकता है या वह संज्ञेय अपराध नहीं है, तब मजिस्ट्रेट, इसमें इसके पूर्व अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अपने विवेकानुसार, आरोप विरचित किए जाने से…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की अनुपस्थिति।
जब शिकायत के आधार पर कार्यवाही शुरू की गई हो और मामले की सुनवाई के लिए निर्धारित किसी भी दिन शिकायतकर्ता अनुपस्थित हो, और अपराध का विधिवत समझौता किया जा सकता हो या वह संज्ञेय अपराध न हो, तो मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता को उपस्थित होने के लिए तीस दिन का समय देने के बाद, अपने विवेक से, इसमें पहले निहित किसी भी बात के बावजूद,…
पूरा पढ़ेंधारा 250. युक्तियुक्त कारण के बिना अभियोग लगाने के लिए प्रतिकर
250. युक्तियुक्त कारण के बिना अभियोग लगाने के लिए प्रतिकर (1) यदि परिवाद पर, या पुलिस अधिकारी को या मजिस्ट्रेट को दी गई इत्तिला पर, संस्थित किसी मामले में एक या अधिक व्यक्ति मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे किसी अपराध के अभियुक्त हैं, जो मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है, और वह मजिस्ट्रेट, जिसके द्वारा मामला सुना जाता है, सभी…
पूरा पढ़ेंबिना उचित कारण के आरोप लगाने पर मुआवजा।
(1) यदि किसी शिकायत या पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना के आधार पर किसी मामले में, एक या एक से अधिक व्यक्ति मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी ऐसे अपराध के लिए आरोपित हैं, जिस पर मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है, और जिस मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की सुनवाई की जाती है वह सभी या किसी भी आरोपी को बरी कर देता है, और मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 251. अभियोग का सार बताया जाना
251. अभियोग का सार बताया जाना जब किसी समन-मामले में अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, तब उस अपराध की विशिष्टियां, जिसका वह अभियुक्त है, उसे बताई जाएंगी और उससे पूछा जाएगा कि क्या वह दोषी होने का अभिवाक् करता है या उसे कोई प्रतिरक्षा करनी है, किंतु औपचारिक आरोप विरचित करना आवश्यक न होगा।
पूरा पढ़ेंआरोप का सार बताया जाना चाहिए।
जब किसी समन मामले में आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या उसे लाया जाता है, तो उसे उस अपराध का विवरण बताया जाएगा जिसका उस पर आरोप है, और उससे पूछा जाएगा कि क्या वह दोषी होने की बात स्वीकार करता है या उसके पास बचाव में कुछ कहना है, लेकिन औपचारिक आरोप तय करना आवश्यक नहीं होगा। बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट आरोप को…
पूरा पढ़ेंधारा 252. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
252. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि यदि अभियुक्त दोषी होने का अभिवाक् करता है, तो मजिस्ट्रेट उस अभिवाक् को यथासंभव उन्हीं शब्दों में अभिलिखित करेगा, जो अभियुक्त द्वारा प्रयोग किए गए हैं, और अपने विवेकानुसार उस पर उसे दोषसिद्ध कर सकेगा।
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो मजिस्ट्रेट अभियुक्त द्वारा प्रयुक्त शब्दों में यथासंभव उसका बयान दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंधारा 253. क्षुद्र मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
253. क्षुद्र मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि (1) जहां धारा 206 के अधीन कोई समन जारी किया गया है और अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर हुए बिना आरोप के लिए दोषी होने का अभिवचन करना चाहता है, वहां वह मजिस्ट्रेट को डाक द्वारा या संदेशवाहक द्वारा एक पत्र भेजेगा, जिसमें उसका अभिवाक्…
पूरा पढ़ेंछोटे-मोटे मामलों में आरोपी की अनुपस्थिति में दोषी होने की स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि।
(1) जहां धारा 229 के तहत समन जारी किया गया है और आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हुए बिना आरोप स्वीकार करना चाहता है, तो वह डाक या संदेशवाहक द्वारा मजिस्ट्रेट को एक पत्र भेजेगा जिसमें उसका निवेदन और समन में निर्दिष्ट जुर्माने की राशि भी होगी। (2) मजिस्ट्रेट अपने विवेक से, अभियुक्त की अनुपस्थिति में, उसके अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 254. दोषसिद्ध न किए जाने पर प्रक्रिया
254. दोषसिद्ध न किए जाने पर प्रक्रिया (1) यदि मजिस्ट्रेट अभियुक्त को धारा 252 या धारा 253 के अधीन दोषसिद्ध नहीं करता है, तो मजिस्ट्रेट अभियोजन को सुनने और ऐसा सब साक्ष्य लेने के लिए, जो अभियोजन के समर्थन में पेश किया जाए, तथा अभियुक्त को सुनने और ऐसा सब साक्ष्य लेने के लिए, जो वह अपनी प्रतिरक्षा में पेश करे, अग्रसर…
पूरा पढ़ेंदोषी न ठहराए जाने की स्थिति में प्रक्रिया।
(1) यदि मजिस्ट्रेट धारा 275 या धारा 276 के तहत अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराता है, तो मजिस्ट्रेट अभियोजन पक्ष की सुनवाई करेगा और अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्य लेगा, और अभियुक्त की भी सुनवाई करेगा और उसके बचाव में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्य लेगा। (2) मजिस्ट्रेट, यदि वह उचित समझे, तो अभियोजन पक्ष…
पूरा पढ़ेंधारा 255. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
255. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि (1) यदि मजिस्ट्रेट, धारा 254 में निर्दिष्ट साक्ष्य तथा ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो, जो वह स्वप्रेरणा से पेश कराए, लेने पर अभियुक्त को दोषी नहीं पाता है, तो वह दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा। (2) जहां मजिस्ट्रेट धारा 325 या धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता है, वहां…
पूरा पढ़ेंदोषमुक्ति या दोषसिद्धि।
(1) यदि मजिस्ट्रेट धारा 277 में निर्दिष्ट साक्ष्य और ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो, जो वह स्वयं प्रस्तुत करवाए, पर विचार करने के बाद अभियुक्त को निर्दोष पाता है, तो वह बरी करने का आदेश दर्ज करेगा। (2) जहाँ मजिस्ट्रेट धारा 364 या धारा 401 के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता है, तो यदि वह अभियुक्त को दोषी…
पूरा पढ़ें- CRPC §206BNSS §229
धारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
मामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
- CRPC §207BNSS §230
अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
- CRPC §208BNSS §231
धारा 208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना
सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्तों को बयानों और दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराना।
- CRPC §209BNSS §232
धारा 209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना
जब अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मामले को सत्र न्यायालय को सौंप दिया जाता है।
- CRPC §210BNSS §233
धारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
किसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
- CRPC §211BNSS §234
धारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
आरोप की सामग्री।
- CRPC §212BNSS §235
धारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
समय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
- CRPC §213BNSS §236
धारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
अपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
- CRPC §214BNSS §237
धारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
यहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
- CRPC §215BNSS §238
धारा 215. गलतियों का प्रभाव
त्रुटियों का प्रभाव।
- CRPC §216BNSS §239
धारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
न्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
- CRPC §217BNSS §240
धारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
आरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
- CRPC §218BNSS §241
धारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
- CRPC §219BNSS §242
धारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
एक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।
- CRPC §220BNSS §243
धारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
एक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
- CRPC §221BNSS §244
धारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
जहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
- CRPC §222BNSS §245
धारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
जब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
- CRPC §223BNSS §246
धारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
- CRPC §224BNSS §247
धारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
कई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
- CRPC §225BNSS §248
धारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
इस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
- CRPC §226BNSS §249
धारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
अभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
- CRPC §227BNSS §250
धारा 227. उन्मोचन
स्राव होना।
- CRPC §228BNSS §251
धारा 228. आरोप की विरचना
आरोप का निर्धारण।
- CRPC §229BNSS §252
दोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
- CRPC §230BNSS §253
अभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
- CRPC §231BNSS §254
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- CRPC §232BNSS §255
बरी होना।
- CRPC §233BNSS §256
रक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
- CRPC §234BNSS §257
धारा 234. तर्क
तर्क।
- CRPC §235BNSS §258
धारा 235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय
दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय।
- CRPC §236BNSS §259
धारा 236. पूर्व दोषसिद्धि
पूर्व दोषसिद्धि।
- CRPC §237BNSS §260
धारा 237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया
धारा 222 की उपधारा (2) के तहत दायर मामलों में प्रक्रिया।
- CRPC §238BNSS §261
धारा 238. धारा 207 का अनुपालन
धारा 230 का अनुपालन।
- CRPC §239BNSS §262
धारा 239. कब अभियुक्त उन्मोचित किया जाएगा
जब आरोपी को बरी कर दिया जाएगा।
- CRPC §240BNSS §263
धारा 240. आरोप की विरचना
आरोप का निर्धारण।
- CRPC §241BNSS §264
धारा 241. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
दोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
- CRPC §242BNSS §265
धारा 242. अभियोजन के लिए साक्ष्य
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- CRPC §243BNSS §266
धारा 243. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य
बचाव पक्ष के साक्ष्य।
- CRPC §244BNSS §267
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- CRPC §245BNSS §268
धारा 245. अभियुक्त कब उन्मोचित किया जाएगा
जब आरोपी को बरी कर दिया जाएगा।
- CRPC §246BNSS §269
वह प्रक्रिया जिसमें आरोपी को बरी नहीं किया जाता है।
- CRPC §247BNSS §270
धारा 247. प्रतिरक्षा के लिए साक्ष्य
बचाव पक्ष के साक्ष्य।
- CRPC §248BNSS §271
धारा 248. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
दोषमुक्ति या दोषसिद्धि।
- CRPC §249BNSS §272
धारा 249. परिवादी की अनुपस्थिति
शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति।
- CRPC §250BNSS §273
धारा 250. युक्तियुक्त कारण के बिना अभियोग लगाने के लिए प्रतिकर
बिना उचित कारण के आरोप लगाने पर मुआवजा।
- CRPC §251BNSS §274
धारा 251. अभियोग का सार बताया जाना
आरोप का सार बताया जाना चाहिए।
- CRPC §252BNSS §275
धारा 252. दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
दोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
- CRPC §253BNSS §276
धारा 253. क्षुद्र मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में दोषी होने के अभिवाक् पर दोषसिद्धि
छोटे-मोटे मामलों में आरोपी की अनुपस्थिति में दोषी होने की स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि।
- CRPC §254BNSS §277
धारा 254. दोषसिद्ध न किए जाने पर प्रक्रिया
दोषी न ठहराए जाने की स्थिति में प्रक्रिया।
- CRPC §255BNSS §278
धारा 255. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
दोषमुक्ति या दोषसिद्धि।

