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157 प्रविष्टियाँ
धारा 2. परिभाषाएं
2. परिभाषाएं इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है; (ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप…
पूरा पढ़ेंपरिभाषाएँ।
(1) इस संहिता में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) “ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक” का अर्थ है वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, पहचान, तलाशी और साक्ष्य की जब्ती की प्रक्रियाओं की रिकॉर्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक संचार का प्रसारण और ऐसे अन्य उद्देश्यों के लिए तथा ऐसे अन्य साधनों द्वारा किसी भी संचार उपकरण का उपयोग, जैसा कि राज्य…
पूरा पढ़ेंधारा 2. परिभाषाएं
2. परिभाषाएं इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है; (ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप…
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धारा 2. परिभाषाएं
2. परिभाषाएं इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है; (ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप…
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धारा 2. परिभाषाएं
2. परिभाषाएं इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है; (ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप…
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धारा 20. कार्यपालक मजिस्ट्रेट
20. कार्यपालक मजिस्ट्रेट (1) राज्य सरकार हर जिले में और हर महानगर क्षेत्र में उतने व्यक्तियों को, जितने वह ठीक समझे, कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी और उनमें से एक को जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त करेगी। (2) राज्य सरकार किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को अपर जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी, और ऐसे मजिस्ट्रेट को इस संहिता…
पूरा पढ़ेंकार्यकारी मजिस्ट्रेट।
(1) प्रत्येक जिले में, राज्य सरकार जितने चाहे उतने व्यक्तियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है और उनमें से एक को जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त करेगी। (2) राज्य सरकार किसी कार्यपालिका मजिस्ट्रेट को अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है, और ऐसे मजिस्ट्रेट को इस संहिता या उस समय लागू किसी अन्य कानून के अधीन…
पूरा पढ़ेंधारा 21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट राज्य सरकार, ऐसी अवधि के लिए, जो वह ठीक समझे, विशिष्ट क्षेत्रों के लिए या विशिष्ट कृत्यों के पालन के लिए, कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी, जो विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के रूप में ज्ञात होंगे, और ऐसे विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को ऐसी शक्तियां प्रदान कर सकेगी, जो इस संहिता के अधीन…
पूरा पढ़ेंविशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
राज्य सरकार, उचित समझे जाने वाले कार्यकाल के लिए, कार्यवाहक मजिस्ट्रेट या पुलिस अधीक्षक या समकक्ष पद से कम रैंक के किसी पुलिस अधिकारी को विशेष कार्यवाहक मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त कर सकती है, जो विशिष्ट क्षेत्रों या विशिष्ट कार्यों के निष्पादन के लिए नियुक्त किए जाएंगे, और ऐसे विशेष कार्यवाहक मजिस्ट्रेटों को वे…
पूरा पढ़ेंधारा 22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता
22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता (1) राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, जिला मजिस्ट्रेट, समय-समय पर, उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएं परिनिश्चित कर सकेगा, जिनके भीतर कार्यपालक मजिस्ट्रेट उन सब या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहिता के अधीन उनमें निहित की जाएं। (2) ऐसे परिनिश्चयन…
पूरा पढ़ेंकार्यपालिका का स्थानीय अधिकार क्षेत्र।
(1) राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, जिला मजिस्ट्रेट समय-समय पर उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएँ निर्धारित कर सकता है जिनके भीतर कार्यपालिका मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन उन्हें सौंपी गई सभी या किसी भी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। (2) ऐसी परिभाषा द्वारा अन्यथा प्रदान किए जाने के अलावा, प्रत्येक मजिस्ट्रेट का…
पूरा पढ़ेंधारा 23. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की अधीनता
23. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की अधीनता (1) अपर जिला मजिस्ट्रेट से भिन्न सब कार्यपालक मजिस्ट्रेट जिला मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होंगे, और किसी उपखंड में शक्तियों का प्रयोग करने वाला हर कार्यपालक मजिस्ट्रेट (उपखंड मजिस्ट्रेट से भिन्न) उपखंड मजिस्ट्रेट के भी अधीनस्थ होगा, किन्तु यह जिला मजिस्ट्रेट के साधारण नियंत्रण के अधीन…
पूरा पढ़ेंकार्यकारी मजिस्ट्रेटों की अधीनता।
(1) सभी कार्यकारी मजिस्ट्रेट जिला मजिस्ट्रेट के अधीन होंगे, और प्रत्येक कार्यकारी मजिस्ट्रेट (उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के अलावा) जो किसी उप-विभाग में शक्तियों का प्रयोग करता है, वह भी उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के अधीन होगा, जिला मजिस्ट्रेट के सामान्य नियंत्रण के अधीन। (2) जिला मजिस्ट्रेट समय-समय पर इस संहिता के अनुरूप नियम…
पूरा पढ़ेंधारा 24. लोक अभियोजक
24. लोक अभियोजक (1) हर उच्च न्यायालय के लिए, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, उस उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, ऐसे न्यायालय में केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की, जैसी भी स्थिति हो, ओर से किसी अभियोजन, अपील या अन्य कार्यवाही के संचालन के लिए एक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और एक या अधिक अपर लोक अभियोजक भी नियुक्त कर…
पूरा पढ़ेंलोक अभियोजक।
(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए, केंद्र सरकार या राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श करने के बाद, एक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और ऐसे न्यायालय में केंद्र सरकार या राज्य सरकार की ओर से किसी भी अभियोग, अपील या अन्य कार्यवाही का संचालन करने के लिए एक या एक से अधिक अतिरिक्त लोक अभियोजक भी नियुक्त कर सकती है: परंतु यह…
पूरा पढ़ेंधारा 25. सहायक लोक अभियोजक
25. सहायक लोक अभियोजक (1) राज्य सरकार हर जिले में मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों में अभियोजनों के संचालन के लिए एक या अधिक सहायक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी। (1क) केंद्रीय सरकार मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों में किसी मामले या मामलों के वर्ग के संचालन के प्रयोजन के लिए एक या अधिक सहायक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकेगी। (2) उपधारा…
पूरा पढ़ेंसहायक लोक अभियोजक।
(1) राज्य सरकार प्रत्येक जिले में मजिस्ट्रेट न्यायालयों में अभियोजन चलाने के लिए एक या एक से अधिक सहायक लोक अभियोजकों की नियुक्ति करेगी। (2) केंद्र सरकार मजिस्ट्रेट न्यायालयों में किसी मामले या मामलों के वर्ग के संचालन के उद्देश्य से एक या एक से अधिक सहायक लोक अभियोजकों की नियुक्ति कर सकती है। (3) उपधारा (1) और (2)…
पूरा पढ़ेंधारा 25A. अभियोजन निदेशालय
25A. अभियोजन निदेशालय (1) राज्य सरकार एक अभियोजन निदेशालय स्थापित कर सकेगी, जो एक अभियोजन निदेशक और उतने उप अभियोजन निदेशकों से मिलकर बनेगा, जितने वह ठीक समझे। (2) कोई व्यक्ति अभियोजन निदेशक या उप अभियोजन निदेशक नियुक्त किए जाने के लिए तभी पात्र होगा, जब वह कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय करता रहा हो,…
पूरा पढ़ेंअभियोजन निदेशालय।
(1) राज्य सरकार निम्नलिखित की स्थापना कर सकती है,— (क) राज्य में अभियोजन निदेशालय, जिसमें एक अभियोजन निदेशक और जितने चाहें उतने उप-अभियोजन निदेशक होंगे; और (ख) प्रत्येक जिले में एक जिला अभियोजन निदेशालय, जिसमें आवश्यकतानुसार उप निदेशक और सहायक अभियोजन निदेशक होंगे। (2) कोई व्यक्ति नियुक्ति के लिए पात्र होगा,— (क)…
पूरा पढ़ेंधारा 26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं
26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं इस संहिता के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए,— (क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन किसी अपराध का विचारण— (i) उच्च न्यायालय, या (ii) सेशन न्यायालय, या (iii) ऐसे किसी अन्य न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसके द्वारा वह अपराध प्रथम अनुसूची में विचारणीय दिखाया गया है;…
पूरा पढ़ेंवे न्यायालय जिनके द्वारा अपराधों का मुकदमा चलाया जा सकता है।
इस संहिता के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए,— (क) भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत किसी भी अपराध का मुकदमा निम्नलिखित द्वारा चलाया जा सकता है— (i) उच्च न्यायालय; या (ii) सत्र न्यायालय; या (iii) कोई अन्य न्यायालय जिसके द्वारा प्रथम अनुसूची में ऐसे अपराध को विचारणीय दिखाया गया है: बशर्ते कि भारतीय न्याय संहिता,…
पूरा पढ़ेंधारा 27. किशोरों के मामले में अधिकारिता
27. किशोरों के मामले में अधिकारिता ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई अपराध, जो उस तारीख को, जब वह न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, सोलह वर्ष से कम आयु का है और जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा, या बालक अधिनियम, 1960 (1960 का 60) के अधीन, अथवा…
पूरा पढ़ेंहटाई गई धारा
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धारा 28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं
28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं (1) उच्च न्यायालय विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश दे सकता है। (2) सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश दे सकता है; किन्तु ऐसे किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया मृत्यु दंडादेश उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के अधीन होगा। (3)…
पूरा पढ़ेंउच्च न्यायालयों और सत्र न्यायाधीशों द्वारा दी जाने वाली सजाएँ।
(1) उच्च न्यायालय विधि द्वारा अधिकृत कोई भी सजा सुना सकता है। (2) सत्र न्यायाधीश या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कानून द्वारा अधिकृत कोई भी सजा सुना सकता है; लेकिन ऐसे किसी न्यायाधीश द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के अधीन होगी।
पूरा पढ़ेंधारा 29. वे दंडादेश जो मजिस्ट्रेट दे सकते हैं
29. वे दंडादेश जो मजिस्ट्रेट दे सकते हैं (1) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय, मृत्यु या आजीवन कारावास या सात वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दंडादेश के सिवाय, विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश दे सकता है। (2) प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट का न्यायालय तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास का, या दस हजार रुपए से अनधिक…
पूरा पढ़ेंवे सजाएँ जो मजिस्ट्रेट सुना सकते हैं।
(1) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय कानून द्वारा अधिकृत कोई भी सजा दे सकता है, सिवाय मृत्युदंड या आजीवन कारावास या सात वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के। (2) प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट का न्यायालय तीन वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास, या पचास हजार रुपये से अधिक का जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा की सजा…
पूरा पढ़ेंधारा 30. जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर कारावास का दंडादेश
30. जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर कारावास का दंडादेश (1) मजिस्ट्रेट का न्यायालय जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर कारावास की ऐसी अवधि अधिनिर्णीत कर सकेगा, जो विधि द्वारा प्राधिकृत है: परन्तु वह अवधि— (क) धारा 29 के अधीन मजिस्ट्रेट की शक्तियों से अधिक न होगी; (ख) जहां कारावास मूल दंडादेश के भाग के रूप में…
पूरा पढ़ेंजुर्माना न भरने पर कारावास की सजा।
(1) मजिस्ट्रेट का न्यायालय जुर्माने का भुगतान न करने की स्थिति में ऐसी कारावास अवधि प्रदान कर सकता है जो कानून द्वारा अधिकृत हो: बशर्ते कि यह अवधि--- (क) धारा 23 के अधीन मजिस्ट्रेट की शक्तियों से अधिक नहीं है; (ख) जहां कारावास को मूल सजा के भाग के रूप में प्रदान किया गया है, वहां कारावास की अवधि के एक चौथाई से अधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 31. एक ही विचारण में कई अपराधों के लिए दोषसिद्धि की दशा में दंडादेश
31. एक ही विचारण में कई अपराधों के लिए दोषसिद्धि की दशा में दंडादेश (1) जब कोई व्यक्ति एक ही विचारण में दो या अधिक अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, तब भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 71 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायालय उसे ऐसे अपराधों के लिए विहित पृथक्-पृथक् दंडों में से उन दंडों का दंडादेश दे सकेगा,…
पूरा पढ़ेंएक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दोषी पाए जाने पर दी जाने वाली सजा।
(1) जब किसी व्यक्ति को एक ही मुकदमे में दो या दो से अधिक अपराधों का दोषी पाया जाता है, तो न्यायालय, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, उसे ऐसे अपराधों के लिए उन विभिन्न दंडों से सजा दे सकता है जो ऐसे न्यायालय को देने में सक्षम हैं और न्यायालय, अपराधों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए,…
पूरा पढ़ेंधारा 32. शक्तियां प्रदान करने की रीति
32. शक्तियां प्रदान करने की रीति (1) इस संहिता के अधीन शक्तियां प्रदान करने में, यथास्थिति, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार, आदेश द्वारा, व्यक्तियों को विशेष रूप से नाम से या उनके पदों के आधार पर, अथवा अधिकारियों के वर्गों को साधारणतया उनके पदीय अभिधानों द्वारा सशक्त कर सकेगी। (2) ऐसा प्रत्येक आदेश उस तारीख से प्रभावी…
पूरा पढ़ेंशक्तियां प्रदान करने की विधि।
(1) इस संहिता के अधीन शक्तियाँ प्रदान करते समय, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार, जैसा भी मामला हो, आदेश द्वारा व्यक्तियों को विशेष रूप से नाम से या उनके पदों के आधार पर या अधिकारियों के वर्गों को सामान्यतः उनके आधिकारिक पदनामों द्वारा सशक्त कर सकती है। (2) ऐसा प्रत्येक आदेश उस तिथि से प्रभावी होगा जिस तिथि को वह इस…
पूरा पढ़ेंधारा 33. नियुक्त अधिकारियों की शक्तियां
33. नियुक्त अधिकारियों की शक्तियां जब कभी सरकार की सेवा में कोई पद धारण करने वाला ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे उच्च न्यायालय या राज्य सरकार द्वारा किसी स्थानीय क्षेत्र भर में इस संहिता के अधीन कोई शक्तियां प्रदान की गई हैं, उसी प्रकार के समान या उच्चतर पद पर, उसी राज्य सरकार के अधीन वैसे ही स्थानीय क्षेत्र में, नियुक्त किया…
पूरा पढ़ेंनियुक्त अधिकारियों की शक्तियां।
जब भी कोई व्यक्ति जो सरकार की सेवा में कोई पद धारण करता है और जिसे उच्च न्यायालय या राज्य सरकार द्वारा इस संहिता के तहत किसी स्थानीय क्षेत्र में कोई शक्तियां प्रदान की गई हैं, उसी राज्य सरकार के अधीन उसी स्थानीय क्षेत्र में समान प्रकृति के किसी उच्च पद पर नियुक्त किया जाता है, तो जब तक उच्च न्यायालय या राज्य सरकार,…
पूरा पढ़ेंधारा 34. शक्तियों का वापस लिया जाना
34. शक्तियों का वापस लिया जाना (1) यथास्थिति, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार, इस संहिता के अधीन अपने द्वारा किसी व्यक्ति को प्रदान की गई या अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा प्रदान की गई सभी या कोई शक्तियां वापस ले सकेगी। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदान की गई कोई शक्तियां उस संबंधित…
पूरा पढ़ेंशक्तियों की वापसी।
(1) उच्च न्यायालय या राज्य सरकार, जैसा भी मामला हो, इस संहिता के अधीन किसी व्यक्ति या अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी को प्रदत्त सभी या कोई भी शक्तियाँ वापस ले सकती है। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदत्त कोई भी शक्तियाँ उस संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा वापस ली जा सकती हैं, जिसने ऐसी शक्तियाँ प्रदत्त…
पूरा पढ़ेंधारा 35. न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियों का उनके पद-उत्तरवर्तियों द्वारा प्रयोक्तव्य होना
35. न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियों का उनके पद-उत्तरवर्तियों द्वारा प्रयोक्तव्य होना (1) इस संहिता के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग या पालन उसके पद-उत्तरवर्ती द्वारा किया जा सकेगा। (2) जब इस बारे में कोई संदेह हो कि किसी अपर या सहायक सेशन…
पूरा पढ़ेंन्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियां उनके उत्तराधिकारियों द्वारा प्रयोग की जा सकती हैं।
(1) इस संहिता के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए, न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की शक्तियों एवं कर्तव्यों का प्रयोग या निष्पादन उसके उत्तराधिकारी द्वारा किया जा सकता है। (2) जब इस बात को लेकर कोई संदेह हो कि पद का उत्तराधिकारी कौन है, तो सत्र न्यायाधीश लिखित आदेश द्वारा उस न्यायाधीश का निर्धारण करेगा जिसे इस संहिता या इसके…
पूरा पढ़ेंधारा 180. विचारण का स्थान, जहां कार्य किसी अन्य अपराध से संबंध के कारण अपराध है
180. विचारण का स्थान, जहां कार्य किसी अन्य अपराध से संबंध के कारण अपराध है जब कोई कार्य किसी अन्य कार्य से अपने संबंध के कारण अपराध है, और वह अन्य कार्य भी अपराध है, अथवा यदि उसका कर्ता अपराध करने में समर्थ होता तो वह अपराध होता, तब प्रथम वर्णित अपराध की जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसकी स्थानीय…
पूरा पढ़ेंवह स्थान जहां किसी कृत्य का अपराध होने का कारण अन्य अपराध से संबंधित होना है।
जब कोई कार्य किसी अन्य कार्य से संबंधित होने के कारण अपराध है, जो कि अपराध है या यदि कर्ता अपराध करने में सक्षम होता तो वह अपराध होता, तो पहले उल्लिखित अपराध की जांच या मुकदमा उस न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार में वह कार्य किया गया था।
पूरा पढ़ेंधारा 181. कुछ अपराधों के मामले में विचारण का स्थान
181. कुछ अपराधों के मामले में विचारण का स्थान (1) ठग होने का, या ठग द्वारा की गई हत्या का, डकैती का, हत्या सहित डकैती का, डाकुओं के गिरोह का सदस्य होने का, अथवा अभिरक्षा से निकल भागने का, कोई अपराध ऐसे न्यायालय द्वारा जांचा या विचारित किया जा सकेगा, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर वह अपराध किया गया था या अभियुक्त…
पूरा पढ़ेंकुछ अपराधों के मामलों में मुकदमे का स्थान।
(1) डकैती का कोई अपराध, या हत्या के साथ डकैती का अपराध, डकैतों के गिरोह से संबंधित होने का अपराध, या हिरासत से भागने का अपराध, उस न्यायालय द्वारा जांचा या मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके स्थानीय अधिकार क्षेत्र में अपराध किया गया था या आरोपी व्यक्ति पाया जाता है। (2) किसी व्यक्ति के अपहरण या अगवा करने के किसी भी अपराध की…
पूरा पढ़ेंधारा 182. पत्रों आदि द्वारा किए गए अपराध
182. पत्रों आदि द्वारा किए गए अपराध (1) ऐसे किसी अपराध की, जिसके अंतर्गत छल है, यदि प्रवंचना पत्रों या दूरसंचार संदेशों के माध्यम से की जाती है, तो जांच या विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर ऐसे पत्र या संदेश भेजे गए थे या प्राप्त किए गए थे; और छल करने तथा संपत्ति का परिदान…
पूरा पढ़ेंइलेक्ट्रॉनिक संचार, पत्रों आदि के माध्यम से किए गए अपराध।
(1) धोखाधड़ी से संबंधित कोई भी अपराध, यदि धोखाधड़ी इलेक्ट्रॉनिक संचार, पत्रों या दूरसंचार संदेशों के माध्यम से की गई हो, तो उस न्यायालय द्वारा जांच या मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक संचार, पत्र या संदेश भेजे गए हों या प्राप्त हुए हों; और धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति सौंपने…
पूरा पढ़ेंधारा 183. यात्रा या जलयात्रा में किया गया अपराध
183. यात्रा या जलयात्रा में किया गया अपराध जब कोई अपराध उस समय किया जाता है, जब वह व्यक्ति, जिसके द्वारा या जिसके विरुद्ध वह अपराध किया गया है, अथवा वह वस्तु, जिसके बारे में वह अपराध किया गया है, किसी यात्रा या जलयात्रा के अनुक्रम में है, तब उस अपराध की जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसकी स्थानीय…
पूरा पढ़ेंयात्रा या समुद्री सफर के दौरान किया गया अपराध।
जब कोई अपराध उस समय किया जाता है जब वह व्यक्ति या वस्तु जिसके द्वारा या जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, किसी यात्रा या समुद्री यात्रा के दौरान हो, तो उस अपराध की जांच या मुकदमा उस न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार से होकर वह व्यक्ति या वस्तु उस यात्रा या समुद्री यात्रा के दौरान गुजरी हो।
पूरा पढ़ेंधारा 184. एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान
184. एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान जहां— (क) किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं कि धारा 219, धारा 220 या धारा 221 के उपबंधों के आधार पर उस पर ऐसे हर अपराध का आरोप लगाया जा सकता है और एक ही विचारण में उनका विचारण किया जा सकता है, अथवा (ख) कई व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराध या अपराध ऐसे हैं कि धारा…
पूरा पढ़ेंएक साथ विचारणीय अपराधों के लिए मुकदमे का स्थान।
कहाँ- (क) किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं कि धारा 242, धारा 243 या धारा 244 के प्रावधानों के आधार पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए उस पर एक ही बार मुकदमा चलाया जा सकता है; या (ख) अनेक व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराध ऐसे हैं कि धारा 246 के प्रावधानों के अनुसार उन पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा…
पूरा पढ़ेंधारा 185. भिन्न सेशन खंडों में मामलों का विचारण किए जाने का आदेश देने की शक्ति
185. भिन्न सेशन खंडों में मामलों का विचारण किए जाने का आदेश देने की शक्ति इस अध्याय के पूर्ववर्ती उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार यह निदेश दे सकेगी कि किसी जिले में विचारण के लिए सुपुर्द किए गए किन्हीं मामलों या मामलों के वर्ग का विचारण किसी सेशन खंड में किया जा सकेगा: परन्तु ऐसा निदेश उच्च न्यायालय…
पूरा पढ़ेंविभिन्न सत्र प्रभागों में मामलों की सुनवाई का आदेश देने का अधिकार।
इस अध्याय के पूर्ववर्ती प्रावधानों में किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार यह निर्देश दे सकती है कि किसी जिले में विचारण के लिए भेजे गए किसी मामले या मामलों के वर्ग की सुनवाई किसी सत्र प्रभाग में की जाए। बशर्ते कि ऐसा निर्देश संविधान के तहत, या इस संहिता के तहत, या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत उच्च न्यायालय या…
पूरा पढ़ेंधारा 186. संदेह की दशा में उच्च न्यायालय द्वारा यह विनिश्चित किया जाना कि जांच या विचारण किस जिले में होगा
186. संदेह की दशा में उच्च न्यायालय द्वारा यह विनिश्चित किया जाना कि जांच या विचारण किस जिले में होगा जहां दो या अधिक न्यायालयों ने एक ही अपराध का संज्ञान कर लिया है और यह प्रश्न उठता है कि उनमें से किस न्यायालय को उस अपराध की जांच या विचारण करना चाहिए, वहां वह प्रश्न इस प्रकार विनिश्चित किया जाएगा— (क) यदि वे…
पूरा पढ़ेंसंदेह की स्थिति में, उच्च न्यायालय उस जिले का निर्णय करेगा जहां जांच या मुकदमा चलेगा।
जहां दो या दो से अधिक न्यायालयों ने एक ही अपराध का संज्ञान लिया हो और यह प्रश्न उठे कि उनमें से कौन सा न्यायालय उस अपराध की जांच करे या उस पर मुकदमा चलाए, तो प्रश्न का निर्णय इस प्रकार किया जाएगा— (क) यदि न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीन हैं, तो उस उच्च न्यायालय द्वारा; (ख) यदि न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीन…
पूरा पढ़ेंधारा 187. स्थानीय अधिकारिता से परे किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने की शक्ति
187. स्थानीय अधिकारिता से परे किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने की शक्ति (1) जब प्रथम वर्ग के किसी मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण दिखाई देता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर के किसी व्यक्ति ने ऐसी अधिकारिता के बाहर (चाहे भारत के भीतर या भारत के बाहर) ऐसा अपराध किया है, जिसकी धारा 177 से धारा 185 तक…
पूरा पढ़ेंस्थानीय अधिकार क्षेत्र से बाहर किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने का अधिकार।
(1) जब प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी व्यक्ति ने अपने स्थानीय अधिकार क्षेत्र के भीतर, ऐसे अधिकार क्षेत्र के बाहर (चाहे भारत के भीतर हो या बाहर) कोई ऐसा अपराध किया है, जिसकी धारा 197 से 205 (दोनों सहित) या उस समय लागू किसी अन्य कानून के प्रावधानों के तहत उस अधिकार क्षेत्र के भीतर जांच…
पूरा पढ़ेंधारा 188. भारत के बाहर किया गया अपराध
188. भारत के बाहर किया गया अपराध जब कोई अपराध भारत के बाहर— (क) भारत के किसी नागरिक द्वारा, चाहे खुले समुद्र पर या अन्यत्र; अथवा (ख) ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा, जो ऐसा नागरिक नहीं है, भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी जलयान या वायुयान पर, किया जाता है, तब उसके साथ ऐसे अपराध के बारे में इस प्रकार कार्यवाही की जा सकेगी मानो वह…
पूरा पढ़ेंभारत के बाहर किया गया अपराध।
जब कोई अपराध भारत के बाहर किया जाता है— (क) भारत के किसी नागरिक द्वारा, चाहे खुले समुद्र में हो या कहीं और; या (ख) किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो ऐसा नागरिक न हो, भारत में पंजीकृत किसी जहाज या विमान पर, उस अपराध के संबंध में उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जा सकता है मानो वह अपराध भारत के किसी भी स्थान पर किया गया हो जहां वह…
पूरा पढ़ेंधारा 189. भारत के बाहर किए गए अपराधों से संबंधित साक्ष्य की प्राप्ति
189. भारत के बाहर किए गए अपराधों से संबंधित साक्ष्य की प्राप्ति जब भारत के बाहर के किसी राज्यक्षेत्र में किया गया अभिकथित कोई अपराध धारा 188 के उपबंधों के अधीन जांचा या विचारित किया जा रहा है, तब केन्द्रीय सरकार, यदि वह ठीक समझे, यह निदेश दे सकेगी कि उस राज्यक्षेत्र में या उसके लिए किसी न्यायिक अधिकारी के समक्ष, अथवा…
पूरा पढ़ेंभारत के बाहर किए गए अपराधों से संबंधित साक्ष्यों की प्राप्ति।
जब भारत के बाहर किसी क्षेत्र में कथित रूप से किए गए किसी अपराध की धारा 208 के प्रावधानों के तहत जांच या मुकदमा चलाया जा रहा हो, तो केंद्र सरकार, यदि वह उचित समझे, तो यह निर्देश दे सकती है कि उस क्षेत्र में किसी न्यायिक अधिकारी के समक्ष या उस क्षेत्र में भारत के किसी राजनयिक या वाणिज्य दूतावास प्रतिनिधि के समक्ष भौतिक…
पूरा पढ़ेंधारा 190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान (1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, तथा उपधारा (2) के अधीन इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान कर सकेगा— (क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है; (ख) ऐसे…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान।
(1) इस अध्याय के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट और उपधारा (2) के अधीन इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान ले सकता है— (क) किसी विशेष कानून के तहत अधिकृत व्यक्ति द्वारा दायर की गई शिकायत सहित, तथ्यों की शिकायत प्राप्त होने पर, जो ऐसे अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण
191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण जब कोई मजिस्ट्रेट धारा 190 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान करता है, तब कोई साक्ष्य लिए जाने से पहले अभियुक्त को यह बताया जाएगा कि वह इस बात का हकदार है कि मामले की जांच या विचारण किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाए, और यदि अभियुक्त, या यदि एक से अधिक अभियुक्त हैं…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त के आवेदन पर स्थानांतरण।
जब कोई मजिस्ट्रेट धारा 210 की उपधारा (1) के खंड (ग) के तहत किसी अपराध का संज्ञान लेता है, तो साक्ष्य लेने से पहले आरोपी को सूचित किया जाएगा कि उसे किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की जांच या सुनवाई कराने का अधिकार है, और यदि आरोपी या एक से अधिक आरोपियों में से कोई भी संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की…
पूरा पढ़ेंधारा 192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना
192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना (1) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान करने के पश्चात्, मामले को जांच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट को सौंप सकेगा। (2) प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, किसी अपराध का संज्ञान…
पूरा पढ़ेंमामलों को मजिस्ट्रेटों को सौंपना।
(1) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद मामले को जांच या परीक्षण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट को सौंप सकता है। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में सशक्त किया गया प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद, मामले को जांच या परीक्षण के लिए ऐसे…
पूरा पढ़ेंधारा 193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान
193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, कोई सत्र न्यायालय आरंभिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा, जब तक कि मामला इस संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सुपुर्द न कर…
पूरा पढ़ेंसत्र न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान लेना।
जब तक इस संहिता या किसी अन्य कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अन्यथा प्रावधान न किया गया हो, कोई भी सत्र न्यायालय मूल क्षेत्राधिकार के न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक कि मामला इस संहिता के तहत किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सौंपा न गया हो।
पूरा पढ़ेंधारा 194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण
194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण अपर सत्र न्यायाधीश या सहायक सत्र न्यायाधीश ऐसे मामलों का विचारण करेगा, जो उस सत्र खंड का सत्र न्यायाधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा विचारण के लिए उसे सौंपे, या जिनका विचारण करने का निदेश उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा उसे दे।
पूरा पढ़ेंअतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को सौंपे गए मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त किया गया है।
एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ऐसे मामलों की सुनवाई करेगा जिन्हें संभागीय सत्र न्यायाधीश सामान्य या विशेष आदेश द्वारा उसे सुनवाई के लिए सौंप सकता है या जिन्हें उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा उसे सुनवाई करने का निर्देश दे सकता है।
पूरा पढ़ेंलोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा-- (क) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 172 से 188 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का, या (ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में, या (iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य…
पूरा पढ़ेंलोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा— (क) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 (दोनों सहित, लेकिन धारा 209 को छोड़कर) के तहत दंडनीय किसी अपराध का; या (ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में; या (iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, सिवाय इसके कि संबंधित…
पूरा पढ़ेंधारा 195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया
195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया कोई साक्षी या कोई अन्य व्यक्ति भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 195क के अधीन किसी अपराध के संबंध में परिवाद फाइल कर सकेगा।
पूरा पढ़ेंधमकी आदि के मामलों में गवाहों के लिए प्रक्रिया।
कोई गवाह या कोई अन्य व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 232 के तहत किसी अपराध के संबंध में शिकायत दर्ज करा सकता है।
पूरा पढ़ेंधारा 196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन
196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय— (क) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 6 के अधीन, या धारा 153क, धारा 295क या धारा 505 की उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, या (ख) ऐसा अपराध करने के किसी आपराधिक षड्यंत्र का, या (ग) ऐसे किसी…
पूरा पढ़ेंराज्य के विरुद्ध अपराधों और ऐसे अपराध करने की आपराधिक साजिश के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय निम्नलिखित मामलों का संज्ञान नहीं लेगा— (क) भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय सात या धारा 196, धारा 299 या धारा 353 की उपधारा (1) के तहत दंडनीय कोई अपराध; या (ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र; या (ग) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 47 में वर्णित किसी भी प्रकार का उकसाना, केंद्र सरकार या…
पूरा पढ़ेंधारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन (1) जब कोई व्यक्ति, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट है या रह चुका है, या ऐसा लोक सेवक है, जो सरकार द्वारा या सरकार की मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते…
पूरा पढ़ेंन्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
(1) जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या रहा है, जिसे सरकार की स्वीकृति के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए किया हो, तो कोई भी न्यायालय लोकपाल और लोकायुक्त…
पूरा पढ़ेंधारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 20 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु— (क) जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या पागल है, या रुग्णता अथवा…
पूरा पढ़ेंवैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से 84 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: उसे उपलब्ध कराया- (क) जहाँ ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता के कारण उच्च स्तर की सहायता की…
पूरा पढ़ेंधारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन कोई न्यायालय भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 498क के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान उन तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, जो ऐसा अपराध गठित करते हैं, या अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या उसके पिता, माता, भाई, बहन द्वारा या उसके पिता या माता के भाई या बहन…
पूरा पढ़ेंभारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा, जब तक कि ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट न हो, या अपराध से पीड़ित व्यक्ति द्वारा, या उसके पिता, माता, भाई, बहन, या उसके पिता या माता के भाई या बहन द्वारा, या न्यायालय की अनुमति से, रक्त, विवाह या दत्तक…
पूरा पढ़ेंधारा 198B. अपराध का संज्ञान
198B. अपराध का संज्ञान कोई न्यायालय, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 376ख के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जहां व्यक्ति वैवाहिक संबंध में हैं, संज्ञान, पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए या किए गए परिवाद पर उन तथ्यों की, जो उस अपराध का गठन करते हैं, प्रथमदृष्ट्या तुष्टि के सिवाय, नहीं करेगा ।
पूरा पढ़ेंअपराध का संज्ञान।
कोई भी न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 67 के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पर अपराध गठित करने वाले तथ्यों से प्रथम दृष्टया संतुष्टि न हो जाए।
पूरा पढ़ेंधारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
199. मानहानि के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 21 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या विकृतचित्त है, या रुग्णता या अंगशैथिल्य के कारण…
पूरा पढ़ेंमानहानि के लिए अभियोग।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता से ग्रस्त हो, या बीमारी या दुर्बलता के कारण शिकायत करने में…
पूरा पढ़ेंधारा 200. परिवादी की परीक्षा
200. परिवादी की परीक्षा परिवाद पर किसी अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी की और उपस्थित साक्षियों की, यदि कोई हों, शपथ पर परीक्षा करेगा और ऐसी परीक्षा का सार लेखबद्ध किया जाएगा तथा उस पर परिवादी और साक्षियों द्वारा और मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किए जाएंगे: परन्तु जब परिवाद लिखित रूप में किया जाता है तब…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की जांच।
(1) किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय अधिकार क्षेत्र रखने वाला मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों (यदि कोई हो) से शपथ पर पूछताछ करेगा और ऐसी पूछताछ का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और उस पर शिकायतकर्ता और गवाहों तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। बशर्ते कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है यदि परिवाद ऐसे मजिस्ट्रेट से किया जाता है जो अपराध का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह— (क) यदि परिवाद लिखित रूप में है तो, उसे इस आशय के पृष्ठांकन सहित उचित न्यायालय के समक्ष पेश किए जाने के लिए लौटा देगा; (ख) यदि परिवाद लिखित…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
यदि शिकायत ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष की जाती है जो अपराध का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह निम्नलिखित कार्य करेगा:— (क) यदि शिकायत लिखित में है, तो उसे उचित न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए इस आशय के पृष्ठांकन के साथ लौटा दें; (ख) यदि शिकायत लिखित में न हो, तो शिकायतकर्ता को उचित न्यायालय में निर्देशित करें।
पूरा पढ़ेंधारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना (1) कोई मजिस्ट्रेट, ऐसे अपराध के परिवाद की प्राप्ति पर जिसका संज्ञान करने के लिए वह प्राधिकृत है या जो धारा 192 के अधीन उसे सौंपा गया है, यदि वह ठीक समझे तो [और उस मामले में करेगा जहां अभियुक्त ऐसे स्थान पर निवास कर रहा है जो उस क्षेत्र से परे है जिसमें वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
(1) किसी मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराध की शिकायत प्राप्त होने पर, जिसका संज्ञान लेने के लिए वह अधिकृत है या जो धारा 212 के अधीन उसे सौंपी गई है, यदि वह उचित समझे तो, और ऐसे मामले में जहां आरोपी उस क्षेत्र से बाहर रहता है जिसमें वह अपना अधिकार क्षेत्र प्रयोग करता है, आरोपी के विरुद्ध प्रक्रिया जारी करने को स्थगित कर सकता है,…
पूरा पढ़ेंधारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
203. परिवाद का खारिज किया जाना यदि परिवादी के और साक्षियों के शपथ पर किए गए कथनों पर (यदि कोई हों) तथा धारा 202 के अधीन की गई जांच या अन्वेषण के (यदि कोई हो) परिणाम पर विचार करने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह परिवाद खारिज कर देगा और ऐसे प्रत्येक मामले में वह…
पूरा पढ़ेंशिकायत खारिज।
यदि शिकायतकर्ता और गवाहों के शपथ पर दिए गए बयानों (यदि कोई हो) और धारा 225 के तहत की गई जांच या छानबीन (यदि कोई हो) के परिणाम पर विचार करने के बाद मजिस्ट्रेट की राय है कि आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह शिकायत को खारिज कर देगा, और ऐसे प्रत्येक मामले में वह ऐसा करने के अपने कारणों को संक्षेप में दर्ज…
पूरा पढ़ेंधारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
204. आदेशिका का जारी किया जाना (1) यदि अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है और मामला— (क) समन-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त की हाजिरी के लिए अपना समन जारी करेगा; अथवा (ख) वारंट-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष या (यदि उसे…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया का मुद्दा।
(1) यदि किसी अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हो, और मामला इस प्रकार प्रतीत हो— (क) समन मामले में, वह अभियुक्त को उसकी उपस्थिति के लिए समन जारी करेगा; या (ख) वारंट के मामले में, वह वारंट जारी कर सकता है, या यदि वह उचित समझे तो समन जारी कर सकता है, ताकि अभियुक्त को…
पूरा पढ़ेंधारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा (1) जब कभी मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तब यदि वह ऐसा करने का कारण देखता है तो वह अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा और उसे अपने प्लीडर द्वारा हाजिर होने की अनुज्ञा दे सकेगा। (2) किंतु मामले की जांच या विचारण करने वाला मजिस्ट्रेट,…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।
(1) जब भी कोई मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तो वह, यदि उसे ऐसा करने का कारण दिखाई दे, तो अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है और उसे अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है। (2) परन्तु मामले की जाँच करने वाला या मुकदमा चलाने वाला मजिस्ट्रेट, अपने विवेक से, कार्यवाही के किसी भी चरण में,…
पूरा पढ़ें- CRPC §2BNSS §2
धारा 2. परिभाषाएं
परिभाषाएँ।
- CRPC §2(f)BNSS §DELETED
धारा 2. परिभाषाएं
हटाई गई धारा
CRPC §2(f)BNSS §DELETED - CRPC §2(k)BNSS §DELETED
धारा 2. परिभाषाएं
हटाई गई धारा
CRPC §2(k)BNSS §DELETED - CRPC §2(q)BNSS §DELETED
धारा 2. परिभाषाएं
हटाई गई धारा
CRPC §2(q)BNSS §DELETED - CRPC §20BNSS §14
धारा 20. कार्यपालक मजिस्ट्रेट
कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
- CRPC §21BNSS §15
धारा 21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
- CRPC §22BNSS §16
धारा 22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता
कार्यपालिका का स्थानीय अधिकार क्षेत्र।
- CRPC §23BNSS §17
धारा 23. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की अधीनता
कार्यकारी मजिस्ट्रेटों की अधीनता।
- CRPC §24BNSS §18
धारा 24. लोक अभियोजक
लोक अभियोजक।
- CRPC §25BNSS §19
धारा 25. सहायक लोक अभियोजक
सहायक लोक अभियोजक।
- CRPC §25ABNSS §20
धारा 25A. अभियोजन निदेशालय
अभियोजन निदेशालय।
- CRPC §26BNSS §21
धारा 26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं
वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराधों का मुकदमा चलाया जा सकता है।
- CRPC §27BNSS §DELETED
धारा 27. किशोरों के मामले में अधिकारिता
हटाई गई धारा
CRPC §27BNSS §DELETED - CRPC §28BNSS §22
धारा 28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं
उच्च न्यायालयों और सत्र न्यायाधीशों द्वारा दी जाने वाली सजाएँ।
- CRPC §29BNSS §23
धारा 29. वे दंडादेश जो मजिस्ट्रेट दे सकते हैं
वे सजाएँ जो मजिस्ट्रेट सुना सकते हैं।
- CRPC §30BNSS §24
धारा 30. जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर कारावास का दंडादेश
जुर्माना न भरने पर कारावास की सजा।
- CRPC §31BNSS §25
धारा 31. एक ही विचारण में कई अपराधों के लिए दोषसिद्धि की दशा में दंडादेश
एक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दोषी पाए जाने पर दी जाने वाली सजा।
- CRPC §32BNSS §26
धारा 32. शक्तियां प्रदान करने की रीति
शक्तियां प्रदान करने की विधि।
- CRPC §33BNSS §27
धारा 33. नियुक्त अधिकारियों की शक्तियां
नियुक्त अधिकारियों की शक्तियां।
- CRPC §34BNSS §28
धारा 34. शक्तियों का वापस लिया जाना
शक्तियों की वापसी।
- CRPC §35BNSS §29
धारा 35. न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियों का उनके पद-उत्तरवर्तियों द्वारा प्रयोक्तव्य होना
न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों की शक्तियां उनके उत्तराधिकारियों द्वारा प्रयोग की जा सकती हैं।
- CRPC §180BNSS §200
धारा 180. विचारण का स्थान, जहां कार्य किसी अन्य अपराध से संबंध के कारण अपराध है
वह स्थान जहां किसी कृत्य का अपराध होने का कारण अन्य अपराध से संबंधित होना है।
- CRPC §181BNSS §201
धारा 181. कुछ अपराधों के मामले में विचारण का स्थान
कुछ अपराधों के मामलों में मुकदमे का स्थान।
- CRPC §182BNSS §202
धारा 182. पत्रों आदि द्वारा किए गए अपराध
इलेक्ट्रॉनिक संचार, पत्रों आदि के माध्यम से किए गए अपराध।
- CRPC §183BNSS §203
धारा 183. यात्रा या जलयात्रा में किया गया अपराध
यात्रा या समुद्री सफर के दौरान किया गया अपराध।
- CRPC §184BNSS §204
धारा 184. एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान
एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए मुकदमे का स्थान।
- CRPC §185BNSS §205
धारा 185. भिन्न सेशन खंडों में मामलों का विचारण किए जाने का आदेश देने की शक्ति
विभिन्न सत्र प्रभागों में मामलों की सुनवाई का आदेश देने का अधिकार।
- CRPC §186BNSS §206
धारा 186. संदेह की दशा में उच्च न्यायालय द्वारा यह विनिश्चित किया जाना कि जांच या विचारण किस जिले में होगा
संदेह की स्थिति में, उच्च न्यायालय उस जिले का निर्णय करेगा जहां जांच या मुकदमा चलेगा।
- CRPC §187BNSS §207
धारा 187. स्थानीय अधिकारिता से परे किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने की शक्ति
स्थानीय अधिकार क्षेत्र से बाहर किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने का अधिकार।
- CRPC §188BNSS §208
धारा 188. भारत के बाहर किया गया अपराध
भारत के बाहर किया गया अपराध।
- CRPC §189BNSS §209
धारा 189. भारत के बाहर किए गए अपराधों से संबंधित साक्ष्य की प्राप्ति
भारत के बाहर किए गए अपराधों से संबंधित साक्ष्यों की प्राप्ति।
- CRPC §190BNSS §210
धारा 190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान।
- CRPC §191BNSS §211
धारा 191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण
अभियुक्त के आवेदन पर स्थानांतरण।
- CRPC §192BNSS §212
धारा 192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना
मामलों को मजिस्ट्रेटों को सौंपना।
- CRPC §193BNSS §213
धारा 193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान
सत्र न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान लेना।
- CRPC §194BNSS §214
धारा 194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को सौंपे गए मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त किया गया है।
- CRPC §195BNSS §215
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
- CRPC §195ABNSS §216
धारा 195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया
धमकी आदि के मामलों में गवाहों के लिए प्रक्रिया।
- CRPC §196BNSS §217
धारा 196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन
राज्य के विरुद्ध अपराधों और ऐसे अपराध करने की आपराधिक साजिश के लिए अभियोजन।
- CRPC §197BNSS §218
धारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
- CRPC §198BNSS §219
धारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
वैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
- CRPC §198ABNSS §220
धारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
- CRPC §198BBNSS §221
धारा 198B. अपराध का संज्ञान
अपराध का संज्ञान।
- CRPC §199BNSS §222
धारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
मानहानि के लिए अभियोग।
- CRPC §200BNSS §223
धारा 200. परिवादी की परीक्षा
शिकायतकर्ता की जांच।
- CRPC §201BNSS §224
धारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
- CRPC §202BNSS §225
धारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
प्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
- CRPC §203BNSS §226
धारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
शिकायत खारिज।
- CRPC §204BNSS §227
धारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
प्रक्रिया का मुद्दा।
- CRPC §205BNSS §228
धारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
मजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।

