धारा 337 · एक बार दोषी ठहराए जाने या बरी किए जाने वाले व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) कोई व्यक्ति जिस पर सक्षम न्यायालय द्वारा किसी अपराध के लिए एक बार मुकदमा चलाया गया हो और उसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो या बरी किया गया हो, जब तक कि ऐसा दोषसिद्धि या बरी होना प्रभावी रहता है, उस पर उसी अपराध के लिए पुनः मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, न ही उन्हीं तथ्यों के आधार पर किसी अन्य अपराध के लिए जिसके लिए धारा 244 की उपधारा (1) के तहत उस पर लगाए गए आरोप से भिन्न आरोप लगाया जा सकता था, या जिसके लिए उसे उसकी उपधारा (2) के तहत दोषी ठहराया जा सकता था।
(2) किसी अपराध से बरी या दोषी ठहराए गए व्यक्ति पर राज्य सरकार की सहमति से बाद में किसी ऐसे विशिष्ट अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके लिए धारा 243 की उपधारा (1) के तहत पूर्व मुकदमे में उसके खिलाफ अलग से आरोप लगाया जा सकता था।
(3) किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे किसी ऐसे कार्य द्वारा गठित किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे कार्य के साथ मिलकर एक भिन्न अपराध बनता हो, जिसके लिए उसे दोषी ठहराया गया था, बाद में ऐसे अंतिम उल्लिखित अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि परिणाम उस समय नहीं हुए थे, या न्यायालय को उनके घटित होने की जानकारी नहीं थी, जब उसे दोषी ठहराया गया था।
(4) किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अपराध से बरी या दोषी ठहराया जा सकता है जो किसी कृत्य द्वारा गठित किया गया हो, ऐसे बरी या दोषी ठहराए जाने के बावजूद, उस पर बाद में उसी कृत्य द्वारा गठित किसी अन्य अपराध का आरोप लगाया जा सकता है और उसके लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि वह न्यायालय जिसने उस पर पहले मुकदमा चलाया था, उस अपराध का मुकदमा चलाने के लिए सक्षम नहीं था जिसके लिए उस पर बाद में आरोप लगाया गया है।
(5) धारा 281 के तहत रिहा किए गए व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए पुनः मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, सिवाय उस न्यायालय की सहमति के जिसने उसे रिहा किया था या किसी अन्य न्यायालय की सहमति के जिसके अधीन प्रथम उल्लिखित न्यायालय है।
(6) इस धारा में कोई बात सामान्य खंड अधिनियम, 1897 (10 ऑफ 1897) की धारा 26 या इस संहिता की धारा 208 के प्रावधानों को प्रभावित नहीं करेगी।
स्पष्टीकरण। —शिकायत खारिज होना या आरोपी को बरी कर देना, इस धारा के प्रयोजनों के लिए दोषमुक्ति नहीं माना जाएगा।
चित्र।
(क) ए पर नौकर के रूप में चोरी का आरोप लगाया जाता है और उसे बरी कर दिया जाता है। बरी होने का फैसला लागू रहने तक उस पर नौकर के रूप में चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता है, न ही उन्हीं तथ्यों के आधार पर साधारण चोरी का, न ही आपराधिक विश्वासघात का।
(ख) ए पर गंभीर चोट पहुंचाने का मुकदमा चलाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। घायल व्यक्ति की बाद में मृत्यु हो जाती है। ए पर गैर इरादतन हत्या का पुनः मुकदमा चलाया जा सकता है।
(ग) ए पर सत्र न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और उसे बी की हत्या के लिए दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में बी की हत्या के लिए उन्हीं तथ्यों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
(घ) प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा ए पर बी को स्वेच्छा से चोट पहुंचाने का आरोप लगाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर बी को स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि मामला इस धारा की उपधारा (3) के अंतर्गत न आता हो।
(ई) ए पर द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा बी से संपत्ति की चोरी का आरोप लगाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर डकैती का आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(f) ए, बी और सी पर प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा डी को लूटने का आरोप लगाया जाता है और उन्हें दोषी ठहराया जाता है। ए, बी और सी पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर डकैती का आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(2) किसी अपराध से बरी या दोषी ठहराए गए व्यक्ति पर राज्य सरकार की सहमति से बाद में किसी ऐसे विशिष्ट अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके लिए धारा 243 की उपधारा (1) के तहत पूर्व मुकदमे में उसके खिलाफ अलग से आरोप लगाया जा सकता था।
(3) किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे किसी ऐसे कार्य द्वारा गठित किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे कार्य के साथ मिलकर एक भिन्न अपराध बनता हो, जिसके लिए उसे दोषी ठहराया गया था, बाद में ऐसे अंतिम उल्लिखित अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि परिणाम उस समय नहीं हुए थे, या न्यायालय को उनके घटित होने की जानकारी नहीं थी, जब उसे दोषी ठहराया गया था।
(4) किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अपराध से बरी या दोषी ठहराया जा सकता है जो किसी कृत्य द्वारा गठित किया गया हो, ऐसे बरी या दोषी ठहराए जाने के बावजूद, उस पर बाद में उसी कृत्य द्वारा गठित किसी अन्य अपराध का आरोप लगाया जा सकता है और उसके लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, यदि वह न्यायालय जिसने उस पर पहले मुकदमा चलाया था, उस अपराध का मुकदमा चलाने के लिए सक्षम नहीं था जिसके लिए उस पर बाद में आरोप लगाया गया है।
(5) धारा 281 के तहत रिहा किए गए व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए पुनः मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, सिवाय उस न्यायालय की सहमति के जिसने उसे रिहा किया था या किसी अन्य न्यायालय की सहमति के जिसके अधीन प्रथम उल्लिखित न्यायालय है।
(6) इस धारा में कोई बात सामान्य खंड अधिनियम, 1897 (10 ऑफ 1897) की धारा 26 या इस संहिता की धारा 208 के प्रावधानों को प्रभावित नहीं करेगी।
स्पष्टीकरण। —शिकायत खारिज होना या आरोपी को बरी कर देना, इस धारा के प्रयोजनों के लिए दोषमुक्ति नहीं माना जाएगा।
चित्र।
(क) ए पर नौकर के रूप में चोरी का आरोप लगाया जाता है और उसे बरी कर दिया जाता है। बरी होने का फैसला लागू रहने तक उस पर नौकर के रूप में चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता है, न ही उन्हीं तथ्यों के आधार पर साधारण चोरी का, न ही आपराधिक विश्वासघात का।
(ख) ए पर गंभीर चोट पहुंचाने का मुकदमा चलाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। घायल व्यक्ति की बाद में मृत्यु हो जाती है। ए पर गैर इरादतन हत्या का पुनः मुकदमा चलाया जा सकता है।
(ग) ए पर सत्र न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और उसे बी की हत्या के लिए दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में बी की हत्या के लिए उन्हीं तथ्यों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
(घ) प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा ए पर बी को स्वेच्छा से चोट पहुंचाने का आरोप लगाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर बी को स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि मामला इस धारा की उपधारा (3) के अंतर्गत न आता हो।
(ई) ए पर द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा बी से संपत्ति की चोरी का आरोप लगाया जाता है और उसे दोषी ठहराया जाता है। ए पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर डकैती का आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(f) ए, बी और सी पर प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा डी को लूटने का आरोप लगाया जाता है और उन्हें दोषी ठहराया जाता है। ए, बी और सी पर बाद में उन्हीं तथ्यों के आधार पर डकैती का आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
पुराने कानून में
BNSS 337CRPC 300
300. Person once convicted or acquitted not to be tried for same offence.
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