धारा 368 · न्यायालय के समक्ष अस्वास्थ्यकर व्यक्ति के मामले में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया।
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(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है और फलस्वरूप अपना बचाव करने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय सर्वप्रथम मानसिक अस्वस्थता और असमर्थता की पुष्टि करेगा, और यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय, उसके समक्ष प्रस्तुत चिकित्सा एवं अन्य साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, इस तथ्य से संतुष्ट हो जाता है, तो वह इस आशय का निर्णय दर्ज करेगा तथा मामले की आगे की कार्यवाही स्थगित कर देगा।
(2) यदि मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय को अभियुक्त मानसिक रूप से अस्वस्थ लगे, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास भेजेगा, और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के बाद, परंतु अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह मुकदमे को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक अवधि के लिए मुकदमे को स्थगित कर देगा।
(4) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है तथा वह बौद्धिक अक्षमता के कारण बचाव करने में असमर्थ है, तो वह मुकदमा नहीं चलाएगा और अभियुक्त के साथ धारा 369 के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
(2) यदि मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय को अभियुक्त मानसिक रूप से अस्वस्थ लगे, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास भेजेगा, और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के बाद, परंतु अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह मुकदमे को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक अवधि के लिए मुकदमे को स्थगित कर देगा।
(4) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है तथा वह बौद्धिक अक्षमता के कारण बचाव करने में असमर्थ है, तो वह मुकदमा नहीं चलाएगा और अभियुक्त के साथ धारा 369 के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
पुराने कानून में
BNSS 368CRPC 329
329. Procedure in case of person of unsound mind tried before Court.
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