Copyright Act 12अध्याय II · Copyright Officeनिरस्त
धारा 12 · प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड की शक्तियां और प्रक्रिया
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(1) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को, किन्हीं ऐसे नियमों के अध्यधीन जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं अपनी प्रक्रिया को स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी जिसके अंतर्गत उसकी बैठकों के स्थान और समय नियत करना भी है:
परन्तु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपने समक्ष संस्थित किसी कार्यवाही को मामूली तौर पर उस अंचल में सुनेगा जिसमें कार्यवाही के संस्थित किए जाने के समय वह व्यक्ति, जो कार्यवाही संस्थित करता है, वास्तव में और स्वच्छेया निवास करता है या कारबार चलाता है, अथवा अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अंचल" से राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 15 में विनिर्दिष्ट अंचल अभिप्रेत है ।
(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड अपनी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग और निर्वहन ऐसी न्यायपीठों के माध्यम से कर सकेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा उसके सदस्यों में से गठित की जाएं:
परंतु यदि अध्यक्ष की यह राय है कि किसी महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई बृहत्तर न्यायपीठ द्वारा की जानी अपेक्षित है तो वह उस मामले को विशेष न्यायपीठ को निर्देशित कर सकेगा जो पांच सदस्यों से मिलकर बनेगी ।
(3) यदि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के या उसकी किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी ऐसे मामले की बाबत जो उसके समक्ष इस अधिनियम के अधीन विनिश्चय के लिए आए, मतभेद हो तो बहुसंख्या की राय अभिभावी होगी:
परन्तु जहां ऐसी बहुसंख्या न हो वहां अध्यक्ष की राय अभिभावी होगी ।
(4) अध्यक्ष अपने सदस्यों में से किसी को उन शक्तियों में से किन्हीं का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जो उसे धारा 74 द्वारा प्रदत्त हैं और ऐसे प्राधिकृत सदस्य द्वारा उन शक्तियों के प्रयोग में दिया गया कोई आदेश या किया गया कोई कार्य, बोर्ड का, यथास्थिति, आदेश या कार्य समझा जाएगा ।
(5) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का कोई सदस्य किसी ऐसे मामले की बाबत जिसमें उसका वैयक्तिक हित है बोर्ड के समक्ष किसी कार्यवाही में भाग नहीं लेगा ।
(6) इस अधिनियम के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा किया गया कोई कार्य या की गई कार्यवाही केवल बोर्ड में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।
(7) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346ट के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा तथा बोर्ड के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।
परन्तु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपने समक्ष संस्थित किसी कार्यवाही को मामूली तौर पर उस अंचल में सुनेगा जिसमें कार्यवाही के संस्थित किए जाने के समय वह व्यक्ति, जो कार्यवाही संस्थित करता है, वास्तव में और स्वच्छेया निवास करता है या कारबार चलाता है, अथवा अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अंचल" से राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 15 में विनिर्दिष्ट अंचल अभिप्रेत है ।
(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड अपनी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग और निर्वहन ऐसी न्यायपीठों के माध्यम से कर सकेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा उसके सदस्यों में से गठित की जाएं:
परंतु यदि अध्यक्ष की यह राय है कि किसी महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई बृहत्तर न्यायपीठ द्वारा की जानी अपेक्षित है तो वह उस मामले को विशेष न्यायपीठ को निर्देशित कर सकेगा जो पांच सदस्यों से मिलकर बनेगी ।
(3) यदि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के या उसकी किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी ऐसे मामले की बाबत जो उसके समक्ष इस अधिनियम के अधीन विनिश्चय के लिए आए, मतभेद हो तो बहुसंख्या की राय अभिभावी होगी:
परन्तु जहां ऐसी बहुसंख्या न हो वहां अध्यक्ष की राय अभिभावी होगी ।
(4) अध्यक्ष अपने सदस्यों में से किसी को उन शक्तियों में से किन्हीं का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जो उसे धारा 74 द्वारा प्रदत्त हैं और ऐसे प्राधिकृत सदस्य द्वारा उन शक्तियों के प्रयोग में दिया गया कोई आदेश या किया गया कोई कार्य, बोर्ड का, यथास्थिति, आदेश या कार्य समझा जाएगा ।
(5) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का कोई सदस्य किसी ऐसे मामले की बाबत जिसमें उसका वैयक्तिक हित है बोर्ड के समक्ष किसी कार्यवाही में भाग नहीं लेगा ।
(6) इस अधिनियम के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा किया गया कोई कार्य या की गई कार्यवाही केवल बोर्ड में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।
(7) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346ट के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा तथा बोर्ड के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।
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