Competition Act 36अध्याय IV · Duties, Powers and Functions of Commission
धारा 36 · आयोग को अपनी कार्यप्रणाली को विनियमित करने का अधिकार है।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
1 [ 36. आयोग की अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति। -- (1) अपने कार्यों के निर्वहन में, आयोग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होगा और इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों और केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए किसी भी नियम के अधीन रहते हुए, आयोग को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्तियाँ होंगी।
(2) इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन हेतु आयोग को वे ही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय को वाद-विवाद करते समय निम्नलिखित मामलों के संबंध में प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी व्यक्ति को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(ई) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1 ऑफ 1872) की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की मांग करना।
(3) आयोग अर्थशास्त्र, वाणिज्य, लेखांकन, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार या किसी अन्य विषय के ऐसे विशेषज्ञों को बुला सकता है जिन्हें वह आयोग द्वारा की जाने वाली किसी भी जांच में सहायता करने के लिए आवश्यक समझता है।
(4) आयोग किसी व्यक्ति को निर्देश दे सकता है--
(क) महानिदेशक या सचिव या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी के समक्ष ऐसी पुस्तकें या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करना, जो ऐसे व्यक्ति की अभिरक्षा में हों या उसके नियंत्रण में हों, जैसा कि निर्देश में निर्दिष्ट या वर्णित किया गया हो, जो किसी व्यापार से संबंधित दस्तावेज हों, जिनकी जांच इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो;
(ख) महानिदेशक या सचिव या उसके द्वारा अधिकृत किसी अन्य अधिकारी को, उस व्यक्ति द्वारा किए जा रहे व्यापार या उससे संबंधित ऐसी अन्य जानकारी, जो उसके पास इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो, प्रस्तुत करना।
(2) इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन हेतु आयोग को वे ही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय को वाद-विवाद करते समय निम्नलिखित मामलों के संबंध में प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी व्यक्ति को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(ई) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1 ऑफ 1872) की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की मांग करना।
(3) आयोग अर्थशास्त्र, वाणिज्य, लेखांकन, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार या किसी अन्य विषय के ऐसे विशेषज्ञों को बुला सकता है जिन्हें वह आयोग द्वारा की जाने वाली किसी भी जांच में सहायता करने के लिए आवश्यक समझता है।
(4) आयोग किसी व्यक्ति को निर्देश दे सकता है--
(क) महानिदेशक या सचिव या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी के समक्ष ऐसी पुस्तकें या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करना, जो ऐसे व्यक्ति की अभिरक्षा में हों या उसके नियंत्रण में हों, जैसा कि निर्देश में निर्दिष्ट या वर्णित किया गया हो, जो किसी व्यापार से संबंधित दस्तावेज हों, जिनकी जांच इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो;
(ख) महानिदेशक या सचिव या उसके द्वारा अधिकृत किसी अन्य अधिकारी को, उस व्यक्ति द्वारा किए जा रहे व्यापार या उससे संबंधित ऐसी अन्य जानकारी, जो उसके पास इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो, प्रस्तुत करना।
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